हिंदी / सहज हिंग्लिश
भारतीय पर्व, व्रत-त्योहार, पंचांग और ऋतु-चक्रहिंदी / सहज हिंग्लिश

अहोई अष्टमी: कार्तिक कृष्ण अष्टमी पर स्याहु माता की कथा, अनजाने में हुई भूल की क्षमा और तारों को अर्घ्य

दीपावली से ठीक एक सप्ताह पूर्व कार्तिक कृष्ण अष्टमी पर मातृ-स्नेह, प्रकृति के नन्हे जीवों के प्रति संवेदना, अनजाने अपराध की क्षमा और तारा-दर्शन की परंपरा।

2026-10-19 7 min · 1,613 words

Direct answer

अहोई अष्टमी कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को, दीपावली से ठीक सात दिन पहले मनाई जाती है। ‘अहोई’ शब्द ‘अनहोनी’ को टालने वाली शक्ति का लोक-रूप है। इस दिन माताएँ दीवार पर अहोई माता और स्याहु (साही) व उसके बच्चों का चित्र बनाकर पूजन करती हैं, अनजाने में जीव-जंतुओं को पहुँची पीड़ा के लिए क्षमा माँगती हैं और संध्या में तारों को अर्घ्य देकर व्रत खोलती हैं।

मथुरा के चौबिया पाड़ा में गेरू से उकेरी गई अहोई माता

दीपावली की सफ़ाई से धुले मथुरा के चौबिया पाड़ा के अपने घर में इकतीस वर्ष की चारु लता शर्मा कटोरी में गेरू और चावल का घोल लिए बैठी थीं। उनकी सात साल की बेटी मिताली पास ही बैठकर बड़े ध्यान से देख रही थी कि माँ दीवार पर आठ कोनों वाली एक आकृति बना रही हैं, जिसके पास एक छोटा-सा वन्य जीव और उसके सात बच्चे भी चित्रित किए गए हैं। मिताली ने उँगली रखकर पूछा, ‘माँ, देवीजी के पास यह काँटों वाला छोटा जानवर कौन है, और आप आज कुदाल या कैंची को हाथ क्यों नहीं लगा रहीं?’ चारु ने तूलिका नीचे रखी और मिताली को गोद में बिठाते हुए कहा कि यही तो इस पर्व की सबसे सुंदर कहानी है।

साही (स्याहु) की कथा: प्रकृति के जीवों की ममता का सम्मान

चारु ने बेटी को बताया कि दीपावली से पहले जब पुराने समय में घरों की लिपाई-पुताई के लिए स्त्रियाँ जंगल या टीले से पीली मिट्टी खोदने जाती थीं, तब ऐसी ही एक साहूकार की बहू या ननद से अनजाने में कुदाल मिट्टी के भीतर बनी साही (जिसे लोक में ‘स्याहु’ कहा गया) की माँद पर चल गई और उसके नन्हे बच्चों को चोट लग गई। अपनी भूल का बोध होने पर उस स्त्री ने अहंकार नहीं दिखाया, बल्कि प्रायश्चित, सेवा और क्षमा-भाव से अपने आचरण को सुधारा। अहोई अष्टमी हमें याद दिलाती है कि जब हम अपना घर सजाने के लिए प्रकृति से मिट्टी या संसाधन लेते हैं, तो हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि हमारे किसी कार्य से किसी मूक प्राणी के घर और संतान को क्षति न पहुँचे।

कार्तिक कृष्ण अष्टमी, पंचांग और तारा-दर्शन का खगोलीय कारण

उत्तर भारत के पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार अहोई अष्टमी कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है। करवा चौथ (चतुर्थी) पर जहाँ चंद्रमा रात्रि के प्रथम प्रहर में ही उदित हो जाता है, वहीं अष्टमी तिथि तक पहुँचते-पहुँचते कृष्ण पक्ष का चंद्रमा आधी रात के आसपास (प्रायः रात्रि ग्यारह से बारह बजे के बाद) उदित होता है। दिन भर के उपवास के बाद गृहस्थ माताओं के लिए इतनी देर रात तक निर्जला प्रतीक्षा करना कठिन न हो, इसलिए लोक-शास्त्र और पंचांग परंपरा ने इस तिथि पर संध्या-काल (गोधूलि के पश्चात) आकाश में उदित होने वाले प्रथम तारों को अर्घ्य देकर व्रत खोलने की सहज व्यवस्था बनाई। कुछ परिवारों में देर रात चंद्र-दर्शन की परंपरा भी है, किंतु अधिकांश उत्तर भारत में तारा-दर्शन ही मुख्य है। आप अपने शहर में अष्टमी तिथि और गोधूलि के बाद तारा-दर्शन का समय दैनिक पंचांग में देख सकते हैं।

अष्टकोष्ठक पुतली, स्याहु की माला और कलश-पूजन

अहोई अष्टमी की पूजा में दीवार पर या कागज़ पर जो चित्र बनाया जाता है, उसे ‘अष्टकोष्ठक’ (आठ कोनों वाली) अहोई पुतली कहते हैं, जो अष्टमी तिथि और अष्टसिद्धियों का प्रतीक है। माताएँ गले में लाल धागे में गुँथी चाँदी की ‘स्याहु’ और चाँदी के मोती पहनती हैं। पूजा स्थान पर जल से भरा करवा या कलश रखा जाता है, जिस पर स्वस्तिक बनाकर सींक (सरकंडे या कुश की तीली) रखी जाती है और हाथ में गेहूँ या ज्वार के सात दाने लेकर कथा सुनी जाती है। इस दिन मिट्टी न खोदने और नुकीले औज़ारों का प्रयोग न करने का नियम वास्तव में अहिंसा और सजगता का प्रतीक है—कि मनुष्य अपनी रोज़मर्रा की भागदौड़ में एक दिन रुककर यह देखे कि उसके हाथों अनजाने में भी किसी जीव को कष्ट तो नहीं पहुँच रहा।

अहोई अष्टमी के प्रमुख प्रतीक और उनका आध्यात्मिक-पारिस्थितिक अर्थ

प्रतीक या विधानपारंपरिक स्वरूपजीवन और परिवार के लिए संदेश
अष्टकोष्ठक अहोई चित्रदीवार पर गेरू या खड़िया से बनी आठ कोनों की देवी आकृतिदिशाओं की रक्षा और अनहोनी को शुभता व धैर्य में बदलने की प्रार्थना
स्याहु (साही) व सात बच्चेदेवी के समीप वन्य जीव साही और उसके शावकों का चित्रणमनुष्येतर प्राणियों के मातृत्व के प्रति संवेदना और पारिस्थितिक करुणा
मिट्टी न खोदने का नियमअष्टमी के दिन खुरपी, कुदाल या नुकीली वस्तु का त्यागअनजाने में होने वाली हिंसा से बचाव और कर्म में सजगता का अभ्यास
रात्रि तारा-अर्घ्यसंध्या के बाद आकाश के तारों को जल अर्पित करनाअंधकार के बीच टिमटिमाते आशा के प्रकाश और नक्षत्र-चक्र के प्रति कृतज्ञता

ब्रज में राधा कुंड स्नान और पुष्य नक्षत्र का संयोग

कार्तिक कृष्ण अष्टमी का एक अत्यंत महत्वपूर्ण आयाम ब्रज के गोवर्धन परिक्रमा मार्ग में स्थित ‘राधा कुंड’ और ‘श्याम कुंड’ से भी जुड़ा है। पद्म पुराण के संदर्भों और ब्रज की मान्यता के अनुसार इसी अष्टमी की अर्धरात्रि में इन कुंडों का प्राकट्य हुआ था। इसलिए अहोई अष्टमी की रात्रि में हज़ारों दंपति राधा कुंड में स्नान कर पेठे (कुम्हड़े) के फल और दीपदान की परंपरा निभाते हैं। ज्योतिषीय दृष्टि से कार्तिक कृष्ण अष्टमी के आसपास चंद्रमा प्रायः कर्क राशि में अपने ही ‘पुष्य’ या ‘आश्लेषा’ नक्षत्र में गोचर करता है। पुष्य नक्षत्र को सभी नक्षत्रों में पोषण करने वाला (पुष्टिदायक) माना गया है, जो मातृ-स्नेह और पारिवारिक संरक्षण के भाव से पूरी तरह मेल खाता है। आप अपनी कुंडली में चंद्रमा, पंचम भाव और पुष्य नक्षत्र की स्थिति मुफ़्त कुंडली टूल से जान सकते हैं।

अपराध-बोध नहीं, करुणा और सुधार का संदेश

अक्सर लोक-कथाओं को सुनते समय मन में यह डर बैठ जाता है कि कहीं हमसे अनजाने में कोई भूल हो गई तो अनिष्ट न हो जाए। परंतु अहोई अष्टमी की कथा का उद्देश्य किसी माँ के मन में अपराध-बोध पैदा करना नहीं है। यह कथा आश्वस्त करती है कि यदि मनुष्य से अज्ञानवश कोई त्रुटि हो भी जाए, तो विनम्रता, सेवा और करुणा के द्वारा उसका परिमार्जन संभव है। धर्मशास्त्र डर दिखाने के लिए नहीं, बल्कि मन को अधिक कोमल और सजग बनाने के लिए हैं।

अहोई अष्टमी के दिन अपनाने योग्य सहज बातें

  • दीपावली की सफ़ाई या बगीचे की गुड़ाई करते समय पक्षियों के घोंसलों और छोटे जीवों के आवास को नुकसान न पहुँचाएँ।
  • गर्भवती या अस्वस्थ माताएँ निर्जला रहने के स्थान पर दूध, फल और जल लें; स्वस्थ माँ ही संतान का सुरक्षा-कवच है।
  • पूजा के बाद घर के बुज़ुर्गों के प्रति सम्मान प्रकट करें और ‘बायना’ को स्नेहपूर्वक साझा करें।
  • संध्या को तारों को अर्घ्य देते समय बच्चों को आकाश के प्रमुख तारों और नक्षत्रों का परिचय कराएँ।
जब एक माँ अपनी संतान की रक्षा के लिए हाथ जोड़ती है और उसी क्षण धरती के हर नन्हे जीव के जीवन का सम्मान करती है, तभी अहोई माता की पूजा पूर्ण होती है।

तारों की छाँव में अर्घ्य और संवेदना का उजाला

संध्या होते ही जब मथुरा के आकाश में पहला तारा दिखा, तो चारु ने मिताली का हाथ पकड़कर अर्घ्य दिया। मिताली ने छत के कोने में रखे मिट्टी के सकोरे में चिड़ियों के लिए पानी और बाजरा भर दिया। Astro Ratan पर आप भारतीय पर्वों, नक्षत्र-गोचर और अपनी कुंडली के पंचम व चतुर्थ भाव को बिना किसी अंधविश्वास के समझ सकते हैं। सात्त्विक जीवन-शैली के लिए वैदिक उपाय तथा गोचर फल भी देखे जा सकते हैं। उस रात मिताली को समझ आ गया था कि त्योहार का उजाला हर जीव के प्रति दया रखने में है।

Key takeaways

  • अहोई अष्टमी पूर्णिमांत कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाई जाती है, जो करवा चौथ के चार दिन बाद और दीपावली से ठीक एक सप्ताह पूर्व आती है।
  • लोकभाषा में ‘अहोई’ का अर्थ है ‘अनहोनी को होनी (शुभ) में बदलने वाली’ माता भगवती पार्वती का करुणामयी स्वरूप।
  • इस व्रत की कथा में कुदाल से मिट्टी खोदते समय साही (स्याहु) के बच्चों को अनजाने में लगी चोट का प्रसंग यह सिखाता है कि हर प्राणी के मातृत्व की पीड़ा एक समान है।
  • कार्तिक कृष्ण अष्टमी को चंद्रमा का उदय देर रात में होता है, इसलिए इस व्रत में संध्या के समय आकाश में तारों का दर्शन कर अर्घ्य देने की अनूठी परंपरा है।
  • ब्रज मंडल में इसी तिथि की अर्धरात्रि को गोवर्धन के पास ‘राधा कुंड’ और ‘श्याम कुंड’ में स्नान व दीपदान की भी विशेष मान्यता है।

अहोई अष्टमी केवल संतान के लिए उपवास नहीं, बल्कि अनजाने में प्रकृति के जीवों को पहुँची चोट के प्रति संवेदना और तारा-दर्शन का पर्व है।

अपने शहर में अहोई अष्टमी की पूजा का समय, तारा-दर्शन मुहूर्त और अपनी कुंडली में पुष्य नक्षत्र व चंद्रमा की स्थिति जानना चाहते हैं? Astro Ratan से पूछिए।

FAQ

अहोई अष्टमी पर चंद्रमा के बजाय तारों को अर्घ्य क्यों दिया जाता है?

कार्तिक कृष्ण अष्टमी को चंद्रमा आधी रात के आसपास देर से उदित होता है। इसलिए उपवास रखने वाली माताओं की सुविधा और नक्षत्र-ज्योति के सम्मान में संध्या के समय तारा-दर्शन कर अर्घ्य देने की परंपरा बनी।

अहोई अष्टमी की कथा में ‘स्याहु’ किसे कहा गया है और उसका क्या महत्व है?

लोकभाषा में ‘स्याहु’ साही नामक वन्य जीव को कहा जाता है जो मिट्टी में माँद बनाकर रहता है। कथा में अनजाने में साही के बच्चों को चोट लगने और उसके प्रायश्चित का वर्णन है, जो अहिंसा और करुणा की शिक्षा देता है।

अहोई अष्टमी पर गोवर्धन के राधा कुंड में स्नान का क्या महत्व है?

मान्यता है कि कार्तिक कृष्ण अष्टमी की अर्धरात्रि को ही राधा कुंड और श्याम कुंड का प्राकट्य हुआ था। इसलिए इस रात्रि वहां स्नान और दीपदान की ब्रज परंपरा है।

अहोई अष्टमी के दिन मिट्टी खोदने या नुकीली वस्तुओं के प्रयोग से क्यों मना किया जाता है?

यह नियम अहोई कथा की स्मृति और अहिंसा के अभ्यास से जुड़ा है, ताकि खुदाई के दौरान अनजाने में भी भूमि के भीतर रहने वाले किसी जीव-जंतु को आघात न पहुँचे।