भीष्म अष्टमी: सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा करने वाले पितामह भीष्म के तर्पण और राजधर्म-उपदेश का स्मरण
माघ शुक्ल अष्टमी पर शर-शय्या से देहत्याग करने वाले गंगापुत्र भीष्म के तर्पण की अनूठी परंपरा, उत्तरायण सूर्य का खगोलीय-आध्यात्मिक महत्व और महाभारत के शांति-अनुशासन पर्व की नीति-शिक्षा।
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भीष्म अष्टमी माघ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है। महाभारत के अनुशासन पर्व के अनुसार कुरुक्षेत्र के युद्ध में शर-शय्या पर पड़े गंगापुत्र भीष्म ने दक्षिणायन में प्राण न त्यागकर सूर्य के उत्तरायण होने और माघ शुक्ल अष्टमी आने पर ही योगबल से देहत्याग किया था। आजीवन ब्रह्मचारी रहने के कारण संपूर्ण भारतीय समाज इस दिन मध्याह्न काल में तिल-जल से पितामह भीष्म का तर्पण करता है और उनके द्वारा दिए गए राजधर्म, दानधर्म तथा विष्णु सहस्रनाम के उपदेश का स्मरण करता है।
वाराणसी के दशाश्वमेध घाट की धूप और प्रोफ़ेसर चंद्रशेखर जी का तर्पण
माघ शुक्ल अष्टमी की उजली दोपहर में वाराणसी के दशाश्वमेध घाट की सीढ़ियों पर बैठकर सेवानिवृत्त संस्कृत प्राध्यापक प्रोफ़ेसर चंद्रशेखर उपाध्याय तांबे के पात्र में गंगाजल, काले तिल और सफेद पुष्प लेकर उत्तराभिमुख बैठे थे। उनके पास ही काशी हिंदू विश्वविद्यालय का उनका चौबीस वर्षीय शोध-छात्र देवेश अपनी नोटबुक लिए बैठा था। प्रोफ़ेसर साहब ने अंजलि में जल भरकर वैयाघ्रपाद गोत्र और सांकृति प्रवर का उच्चारण करते हुए अपुत्र और नैष्ठिक ब्रह्मचारी गंगापुत्र भीष्म के निमित्त तर्पण किया। देवेश ने थोड़ा आश्चर्य से पूछा कि गुरुजी, मैंने सुना है कि श्राद्ध और तर्पण तो केवल अपने कुल के दिवंगत पूर्वजों का किया जाता है, फिर आज पूरे घाट पर अलग-अलग गोत्र और जातियों के लोग पितामह भीष्म को जल क्यों अर्पित कर रहे हैं? प्रोफ़ेसर उपाध्याय ने गंगा की चमकती लहरों की ओर देखते हुए कहा कि देवेश, जिसने अपने पिता शांतनु के सुख के लिए सिंहासन और गृहस्थ जीवन का त्याग कर आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लिया और अंत समय में पूरे समाज को नीति व राजधर्म का कोष सौंप दिया, उस महापुरुष की संतान तो पूरी मानवता ही है।
माघ शुक्ल अष्टमी, उत्तरायण सूर्य और इच्छामृत्यु का खगोलीय-दार्शनिक रहस्य
महाभारत के भीष्म पर्व और अनुशासन पर्व के अनुसार मार्गशीर्ष मास में कुरुक्षेत्र के युद्ध के दसवें दिन जब अर्जुन के बाणों से बिंधकर पितामह भीष्म रथ से नीचे गिरे, तब सूर्य दक्षिणायन में था। उनके पिता महाराज शांतनु ने उनके त्याग से प्रसन्न होकर उन्हें 'स्वच्छंद मृत्यु' (इच्छामृत्यु) का वरदान दिया था, जिसका अर्थ था कि मृत्यु तब तक उनके पास नहीं आ सकती जब तक वे स्वयं जाने का संकल्प न करें। भीष्म ने बाणों की तीक्ष्ण शय्या पर पूरे अट्ठावन दिनों तक असह्य शारीरिक पीड़ा को योगबल और प्राणायाम से साधे रखा और सूर्य के उत्तरायण होने तथा माघ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि आने की प्रतीक्षा की। इसके पीछे छान्दोग्य उपनिषद और श्रीमद्भगवद्गीता के आठवें अध्याय (अक्षरब्रह्मयोग) का गंभीर दर्शन है, जहाँ अग्नि, ज्योति, दिन, शुक्ल पक्ष और छः मास के उत्तरायण को 'देवयान' या 'अर्चिरादि मार्ग' कहा गया है। खगोलीय दृष्टि से उत्तरायण वह काल है जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश कर उत्तर की ओर बढ़ता है, दिन बड़े होने लगते हैं और पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में प्रकाश व प्राणशक्ति का विस्तार होता है। रथसप्तमी (माघ शुक्ल सप्तमी) को सूर्य के रथ की गति पूर्णतः तेजस्वी होने के ठीक अगले दिन, माघ शुक्ल अष्टमी को मध्याह्न काल में भीष्म ने भगवान श्रीकृष्ण के मुखारविंद का ध्यान करते हुए अपने प्राण ब्रह्मरंध्र से उत्सर्ग किए। आप अपने शहर के अनुसार माघ शुक्ल अष्टमी और मध्याह्न काल का समय दैनिक पंचांग में देख सकते हैं।
शांति पर्व और अनुशासन पर्व: शर-शय्या से निकला लोककल्याण का संविधान
अक्सर लोग सोचते हैं कि पितामह भीष्म केवल अपने मोक्ष के लिए उत्तरायण की प्रतीक्षा कर रहे थे, किंतु महाभारत का गहरा अध्ययन एक और बड़ा सत्य उजागर करता है। युद्ध समाप्त होने के बाद जब धर्मराज युधिष्ठिर अपने ही बंधु-बांधवों के रक्तपात से गहरे अवसाद और अपराध-बोध में डूब गए और राज्य त्यागकर वन जाने की बात करने लगे, तब श्रीकृष्ण उन्हें भीष्म के पास ले गए। श्रीकृष्ण जानते थे कि कुरुवंश के वृद्धतम नीतिज्ञ के पास राजनीति, अर्थनीति, न्याय और अध्यात्म का जो संचित अनुभव है, यदि वह उनके साथ ही लुप्त हो गया तो युद्ध के बाद के टूटे हुए भारतवर्ष का पुनर्निर्माण असंभव हो जाएगा। तब बाणों की शय्या पर लेटे भीष्म ने अपनी अंतिम ऊर्जा को समेटकर युधिष्ठिर को राजधर्म, आपद्धर्म और मोक्षधर्म का वह विराट उपदेश दिया, जो महाभारत के शांति पर्व और अनुशासन पर्व के रूप में विश्व-साहित्य की अमूल्य धरोहर है। इसी संवाद के दौरान उन्होंने युधिष्ठिर के प्रश्न—'किमेकं दैवतं लोके' (जगत में एकमात्र आश्रय कौन है)—के उत्तर में 'श्री विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र' का पाठ किया।
भीष्म के राजधर्म की पाँच बड़ी शिक्षाएँ जो आज के नेतृत्व के लिए भी दर्पण हैं
प्रोफ़ेसर उपाध्याय ने देवेश को समझाया कि शांति पर्व में भीष्म ने युधिष्ठिर को जो राजधर्म सिखाया, वह किसी भी युग के प्रशासक, परिवार के मुखिया या संस्था के नेतृत्वकर्ता के लिए व्यावहारिक नीतिशास्त्र है। भीष्म कहते हैं कि राजा या नेता का अपना कोई निजी सुख नहीं होता; प्रजा का सुख ही उसका सुख है (प्रजासुखे सुखं राज्ञः)। उन्होंने कर-व्यवस्था (टैक्स) के लिए भौंरे, माली और ग्वाले का उदाहरण दिया—जैसे भौंरा फूल को बिना रौंदे पराग लेता है, जैसे माली पौधे की जड़ को सींचकर केवल खिले हुए फूल चुनता है, और जैसे ग्वाला बछड़े के हिस्से का दूध छोड़कर ही गाय दुहता है, वैसे ही राज्य या समाज को संसाधनों का दोहन करना चाहिए; कोयले वाले की तरह पेड़ को जड़ से जलाकर नहीं। इसके साथ ही भीष्म ने अपने जीवन की सबसे बड़ी भूल को भी निस्संकोच स्वीकार किया कि द्यूत-सभा में द्रौपदी के अपमान के समय राजा धृतराष्ट्र का अन्न खाने के कारण उनकी बुद्धि और वाणी बँध गई थी—'अर्थस्य पुरुषो दासः'। यह आत्मस्वीकृति सिखाती है कि जब श्रेष्ठ और समर्थ लोग अन्याय के विरुद्ध बोलने का साहस खो देते हैं, तो महाभारत अवश्यंभावी हो जाता है।
भीष्म अष्टमी के शास्त्रीय विधान और उनके दार्शनिक संदेश
| शास्त्रीय अंग / प्रसंग | पंचांग व धर्मशास्त्रीय नियम | जीवन और समाज के लिए संदेश |
|---|---|---|
| मध्याह्न भीष्म तर्पण | माघ शुक्ल अष्टमी को मध्याह्न काल में तिल, जल व कुश से तर्पण (जीवित पिता वाले भी अधिकारी) | निःस्वार्थ त्यागी और ज्ञानदाता महापुरुषों के प्रति संपूर्ण समाज का सामूहिक ऋण-शोधन |
| उत्तरायण प्रतीक्षा (58 दिन) | दक्षिणायन के अंधकार से उत्तरायण के प्रकाश (देवयान मार्ग) तक प्राण-संधान | संकट और पीड़ा के चरम काल में भी धैर्य, संकल्प और आत्म-नियंत्रण न खोने की साधना |
| शांति पर्व (राजधर्म उपदेश) | शर-शय्या से युधिष्ठिर के शोक का निवारण और लोक-कल्याणकारी शासन के सूत्र | अवसाद से निकलकर कर्तव्य-पथ पर लौटने और अपने अनुभव को अगली पीढ़ी को सौंपने का दायित्व |
| श्री विष्णु सहस्रनाम पाठ | भगवान श्रीकृष्ण की उपस्थिति में भीष्म द्वारा सहस्र नामों से परम तत्व की स्तुति | कर्म की कठोरता के बीच भक्ति और मानसिक शांति का संतुलन |
| भीष्म पंचक से भीष्म अष्टमी का संबंध | कार्तिक के अंतिम पाँच दिनों में उपदेश-स्मरण और माघ शुक्ल अष्टमी को निर्वाण स्मृति | ज्ञान के श्रवण से लेकर चरित्र के आचरण तक की अखंड साधना |
ज्योतिषीय दृष्टिकोण: सूर्य, शनि और अष्टम-नवम भाव का संतुलन
वैदिक ज्योतिष के आलोक में देखें तो पितामह भीष्म का व्यक्तित्व सूर्य (आत्मा, राजधर्म, सत्य और उत्तरायण तेज) तथा शनि (कठोर तप, आजीवन ब्रह्मचर्य, अटूट प्रतिज्ञा और दीर्घायु सहनशीलता) के अद्भुत संयोग को दर्शाता है। कुंडली में अष्टम भाव आयु, मृत्यु-तुल्य कष्ट और गूढ़ साधना का होता है, जबकि नवम भाव धर्म, गुरु-उपदेश और पूर्वजों के पुण्य का तथा दशम भाव कर्म व राजधर्म का। जब माघ मास में सूर्य मकर राशि (जो शनि की राशि है) में गोचर कर रहा होता है, तभी माघ शुक्ल सप्तमी (रथसप्तमी) और अष्टमी (भीष्म अष्टमी) का यह संयोग बनता है। मकरस्थ सूर्य में शनि के अनुशासन और सूर्य के प्रकाश का जो मिलन होता है, वही भीष्म अष्टमी की खगोलीय पृष्ठभूमि है। यदि आप जानना चाहते हैं कि आपकी जन्म-कुंडली में सूर्य, शनि और धर्म-कर्म के भाव किस स्थिति में हैं, तो आप मुफ़्त कुंडली टूल पर अपनी कुंडली देख सकते हैं और ग्रहों के वर्तमान प्रभाव को गोचर फल से समझ सकते हैं।
भीष्म तर्पण की सरल विधि और धर्मसिंधु का विशेष नियम
धर्मसिंधु और स्मृतिकौस्तुभ में भीष्म अष्टमी के तर्पण के विषय में एक बहुत महत्वपूर्ण नियम स्पष्ट किया गया है। सामान्य पितृ-तर्पण में केवल वही व्यक्ति जल-तर्पण का अधिकारी होता है जिसके पिता का देहावसान हो चुका हो (जीवत्पितृक को तर्पण का निषेध होता है)। किंतु भीष्म अष्टमी के दिन यह बंधन नहीं है; इस दिन वे लोग भी पितामह भीष्म के निमित्त तर्पण कर सकते हैं जिनके पिता जीवित हैं। मध्याह्न काल में स्नान के उपरांत स्वच्छ वस्त्र पहनकर किसी पवित्र नदी के तट पर या घर में ही एक स्वच्छ पात्र में जल, काले तिल और फूल लेकर प्रसिद्ध श्लोक—'वैयाघ्रपदगोत्राय सांकृतिप्रवराय च। अपुत्राय ददाम्येतत्सलिलं भीष्मवर्मणे॥ वसूनामवताराय शन्तनोरात्मजाय च। अर्घ्यं ददामि भीष्माय आजन्मब्रह्मचारिणे॥'—का उच्चारण करते हुए तीन अंजलि जल अर्पित किया जाता है। यह किसी मृतक का शोक-कर्म नहीं, बल्कि अष्ट वसुओं के अवतार और ज्ञान-वृद्ध पितामह के प्रति श्रद्धा-अर्घ्य है।
भीष्म अष्टमी से हमारे दैनिक जीवन के लिए चार व्यावहारिक सूत्र
- माघ शुक्ल अष्टमी पर भीष्म तर्पण या स्मरण के साथ श्री विष्णु सहस्रनाम अथवा महाभारत के शांति पर्व के कुछ नीति-श्लोकों का स्वाध्याय अवश्य करें।
- भीष्म के जीवन से यह विवेक सीखें कि कोई भी निजी ज़िद या हठ जब समाज और परिवार के न्याय के विरुद्ध जाने लगे, तो वहाँ आत्मचिंतन और धर्म का पक्ष लेना ही श्रेष्ठ है।
- घर और समाज के वरिष्ठजनों के जीवन-अनुभवों को सम्मान दें; उनके पास जो व्यावहारिक ज्ञान और स्मृतियाँ हैं, उन्हें संवाद के माध्यम से सहेजें।
- कठिन परिस्थितियों में जब युधिष्ठिर की तरह मन ग्लानि या पलायन से भर जाए, तब अपने कर्तव्य से भागने के बजाय शांत मन से ज़िम्मेदारी निभाने का संकल्प लें।
बाणों की शय्या पर लेटे भीष्म ने मृत्यु को नहीं रोका था, बल्कि उन्होंने तब तक प्राण थामे रखे जब तक उन्होंने अपने हृदय का सारा नीति-ज्ञान आने वाली पीढ़ी की झोली में नहीं डाल दिया।
देवेश की शोध-दृष्टि और Astro Ratan के साथ पंचांग का अध्ययन
दशाश्वमेध घाट से लौटते समय देवेश ने अपनी नोटबुक में लिखा कि भारतीय पंचांग की तिथियाँ केवल कैलेंडर के अंक नहीं हैं, बल्कि वे खगोल (उत्तरायण सूर्य) और मानव-मूल्यों (राजधर्म व कृतज्ञता) को जोड़ने वाले सेतु हैं। उसने उस शाम छात्रावास लौटकर शांति पर्व के राजधर्म प्रकरण को फिर से पढ़ना शुरू किया। यदि आप भी अपने शहर के अनुसार माघ शुक्ल अष्टमी की सटीक तिथि, मध्याह्न व्यापिनी घड़ी और सूर्य के उत्तरायण गोचर का विवरण जानना चाहते हैं, तो Astro Ratan आपके लिए एक प्रामाणिक मार्गदर्शक है। लाहिड़ी अयनांश और शुद्ध खगोलीय गणनाओं पर आधारित यह मंच आपको बिना किसी अंधविश्वास के हमारी शास्त्रीय परंपराओं का तार्किक अर्थ समझाता है। आप वैदिक उपाय और हिंदी ज्योतिष के माध्यम से भी ज्योतिष व धर्मशास्त्र के अन्य विषयों को पढ़ सकते हैं।
Key takeaways
- माघ शुक्ल अष्टमी वह पावन तिथि है जब इच्छामृत्यु (स्वच्छंद मृत्यु) के वरदान से युक्त पितामह भीष्म ने उत्तरायण सूर्य की साक्षी में अपनी देह का त्याग किया था।
- छान्दोग्य उपनिषद और भगवद्गीता के आठवें अध्याय में वर्णित 'अर्चिरादि मार्ग' (देवयान) का संबंध उत्तरायण, शुक्ल पक्ष और दिन के प्रकाश से है, जो चेतना के ऊर्ध्वगमन का प्रतीक है।
- शर-शय्या पर रहते हुए भीष्म ने युधिष्ठिर को महाभारत के शांति पर्व और अनुशासन पर्व के अंतर्गत राजधर्म, आपद्धर्म, मोक्षधर्म और श्री विष्णु सहस्रनाम का अमर उपदेश दिया।
- धर्मसिंधु का विशेष अपवाद है कि सामान्यतः जीवित पिता वाले व्यक्ति तर्पण नहीं करते, किंतु भीष्म अष्टमी पर जीवित पिता वाले लोग भी वैयाघ्रपाद गोत्र व सांकृति प्रवर के नाम से भीष्म तर्पण कर सकते हैं।
- भीष्म का जीवन यह सिखाता है कि व्यक्तिगत प्रतिज्ञा से भी बड़ा राष्ट्र और न्याय का धर्म होता है; अन्याय के समय मौन रहना सबसे बड़ा नीति-संकट पैदा करता है।
पितामह भीष्म ने 58 दिनों तक बाणों की शय्या पर उत्तरायण सूर्य की प्रतीक्षा क्यों की और क्यों पूरा समाज आज भी उनका तर्पण करता है—यह लेख अवश्य साझा करें।
माघ शुक्ल अष्टमी पर आपके शहर में मध्याह्न भीष्म तर्पण का सटीक समय और उत्तरायण सूर्य की स्थिति जानना चाहते हैं? Astro Ratan से पूछिए।
