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भारतीय ज्योतिष का इतिहास, प्राचीन ग्रंथ, खगोल-परंपरा और तीर्थ-विज्ञानहिंदी / सहज हिंग्लिश

सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग (चतुर्युग / महायुग) की भारतीय काल-गणना और ‘संकल्प मंत्र’ में बोले जाने वाले ब्रह्मांडीय पते का अर्थ

सूर्यसिद्धांत और पुराणों में वर्णित 43 लाख 20 हज़ार वर्षों के चतुर्युग (महायुग), मन्वन्तर व कल्प के गणित से लेकर हर पूजा के प्रारंभ में बोले जाने वाले ‘श्वेतवाराह कल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे...’ संकल्प का शब्दशः अर्थ।

2026-10-19 8 min · 1,799 words

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भारतीय खगोल और पुराण परंपरा में समय को रेखीय नहीं, बल्कि चक्रीय माना गया है। सूर्यसिद्धांत और विष्णु पुराण के अनुसार सतयुग (17,28,000 वर्ष), त्रेतायुग (12,96,000 वर्ष), द्वापरयुग (8,64,000 वर्ष) और कलियुग (4,32,000 वर्ष) के योग से 43,20,000 सौर वर्षों का एक चतुर्युग या महायुग बनता है। प्रत्येक शुभ कर्म के प्रारंभ में बोला जाने वाला ‘संकल्प मंत्र’ इसी कल्प, मन्वन्तर, युग, संवत्सर, अयन, ऋतु, मास, पक्ष, तिथि, वार, नक्षत्र और जम्बूद्वीप-भरतखण्ड के भूगोल में व्यक्ति की वर्तमान स्थिति को जोड़ता है।

पटना के राजेंद्र नगर में सत्यनारायण कथा और मैथिली का सवाल

कार्तिक पूर्णिमा की सुबह पटना के राजेंद्र नगर में छत्तीस वर्षीय सिविल सेवा प्रशिक्षक आशुतोष वर्मा के घर वार्षिक पूजा हो रही थी। कुलपुरोहित पंडित जनार्दन झा ने जब आशुतोष के दाहिने हाथ में जल, अक्षत, पुष्प और सुपारी रखवाकर संकल्प बोलना शुरू किया—ॐ विष्णवे नमः, अद्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपरार्धे श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे प्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे...—तो पास बैठी चौदह वर्षीया बेटी मैथिली बड़े ध्यान से सुनती रही। पूजा संपन्न होने के बाद मैथिली ने पंडित जी से पूछा कि आप हर बार पूजा से पहले यह लंबा-सा वाक्य क्यों बोलते हैं? पंडित जी ने मुस्कुराते हुए कहा कि जैसे तुम इंटरनेट पर किसी जगह को ढूँढने के लिए पहले पृथ्वी, फिर महाद्वीप, फिर देश, राज्य, शहर और पिनकोड ज़ूम करती हो, वैसे ही हमारे ऋषियों ने हज़ारों साल पहले समय (काल) और स्थान (देश) का यह ब्रह्मांडीय जीपीएस बनाया था, जिसे संकल्प कहते हैं।

संकल्प का दर्शन: ‘मैं इस अनंत ब्रह्मांड में कहाँ और कब खड़ा हूँ?’

संस्कृत में संकल्प का अर्थ है सम्यक् कल्पनम्—अर्थात् किसी शुभ कार्य को करने का सुस्पष्ट, सजग और सात्विक मानसिक निश्चय। वैदिक और पौराणिक परंपरा में कोई भी उपासना, दान, व्रत या शुभ कर्म बिना देश-काल के उच्चारण के अधूरा माना गया है। इसका कारण यह है कि जब मनुष्य हाथ में जल लेकर अपने समय और भूगोल का उच्चारण करता है, तो उसका भटका हुआ मन वर्तमान क्षण (यहाँ और अभी) में स्थिर हो जाता है। संकल्प के दो मुख्य भाग होते हैं—पहला भाग है काल-निर्देश (ब्रह्मांडीय समय से लेकर आज के दिन के नक्षत्र व घटी-पल तक), और दूसरा भाग है देश-निर्देश (संपूर्ण पृथ्वी के भूगोल से लेकर उस नदी-तट, नगर और घर तक जहाँ बैठकर कार्य किया जा रहा है)।

चतुर्युग (महायुग) का खगोलीय और पौराणिक गणित

भारतीय काल-गणना में समय की सूक्ष्मतम इकाई ‘त्रुटि’ और ‘प्राण’ (चार सेकंड के बराबर एक श्वास) से शुरू होकर महायुग और कल्प तक जाती है। सूर्यसिद्धांत के प्रथम अध्याय (मध्यमाधिकार) तथा विष्णु पुराण के अनुसार देवताओं का एक वर्ष मनुष्यों के 360 सौर वर्षों के बराबर होता है। चार युगों की लंबाई का अनुपात 4:3:2:1 रखा गया है, जो धर्म के चार चरणों का भी प्रतीक है। सबसे छोटा युग कलियुग है, जिसकी अवधि संध्या और संध्यांश सहित 1,200 दिव्य वर्ष अर्थात् 4,32,000 (चार लाख बत्तीस हज़ार) मानवीय सौर वर्ष है। द्वापरयुग इसका दोगुना अर्थात् 8,64,000 वर्ष; त्रेतायुग तीन गुना अर्थात् 12,96,000 वर्ष; और सतयुग (कृतयुग) चार गुना अर्थात् 17,28,000 वर्ष का होता है। इन चारों युगों को जोड़ने पर एक ‘चतुर्युग’ या ‘महायुग’ बनता है, जिसका कुल मान 43,20,000 (तैंतालीस लाख बीस हज़ार) सौर वर्ष है। खगोल-गणितज्ञों ने इस विशाल संख्या का उपयोग ग्रहों के भगण (पूर्ण परिक्रमाओं) को बिना दशमलव या भिन्न के पूर्णांक में व्यक्त करने के लिए किया था।

मन्वन्तर और कल्प: 4 अरब 32 करोड़ वर्षों का काल-चक्र

महायुग से ऊपर की इकाई ‘मन्वन्तर’ है। एक मन्वन्तर में 71 महायुग (लगभग 30 करोड़ 67 लाख 20 हज़ार सौर वर्ष) होते हैं। ऐसे 14 मन्वन्तरों और उनके पंद्रह संधिकालों को मिलाकर कुल 1,000 महायुगों का एक ‘कल्प’ बनता है। एक कल्प का मान 4,32,00,00,000 (चार अरब बत्तीस करोड़) सौर वर्ष होता है, जिसे सृष्टि के रूपक में ब्रह्मा का एक दिन कहा गया है और इतनी ही लंबी रात्रि मानी गई है। बीसवीं सदी के खगोलविदों (जैसे कार्ल सेगन) ने भी इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया था कि प्राचीन विश्व की किसी अन्य सभ्यता के पास अरबों वर्षों में सोचने वाली ऐसी काल-गणना नहीं थी जो पृथ्वी और सौरमंडल की आधुनिक भू-वैज्ञानिक आयु के इतने निकट बैठती हो।

भारतीय काल-गणना और संकल्प मंत्र की इकाइयों का क्रमिक सार

काल / संकल्प इकाईसंकल्प मंत्र में प्रयुक्त शब्दगणितीय मान / शास्त्रीय अर्थ
परार्ध व कल्पद्वितीयपरार्धे श्वेतवाराहकल्पेमहाकाल के दूसरे भाग का वर्तमान कल्प (1 कल्प = 1000 महायुग = 4.32 अरब सौर वर्ष)
मन्वन्तरवैवस्वतमन्वन्तरे14 मन्वन्तरों में से वर्तमान सातवाँ ‘वैवस्वत’ मन्वन्तर (1 मन्वन्तर = 71 महायुग)
महायुग व वर्तमान युगअष्टाविंशतितमे कलियुगे प्रथमचरणेवैवस्वत मन्वन्तर के 28वें महायुग के कलियुग (4,32,000 वर्ष) का प्रथम चरण (3102 ईसा पूर्व से प्रारंभ)
भौगोलिक पता (देश)जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे आर्यावर्तेयूरेशियाई भू-भाग (जम्बूद्वीप) के दक्षिणी उपमहाद्वीप भारतवर्ष में अपने प्रांत, नदी-क्षेत्र व नगर का नाम
दैनिक पंचांग समयअयन, ऋतु, मास, पक्ष, तिथि, वार, नक्षत्रसूर्य का उत्तरायण/दक्षिणायन, छह में से वर्तमान ऋतु, मास और आज के पंचांग के पाँच अंग

संकल्प के हर शब्द का अर्थ: समय और भूगोल का मिलन

जब हम संकल्प के शब्दों को खोलकर पढ़ते हैं, तो उसकी भव्यता स्पष्ट हो जाती है: (1) द्वितीयपरार्धे—सृष्टि की कुल आयु के दूसरे आधे भाग में; (2) श्वेतवाराहकल्पे—वर्तमान कल्प का नाम श्वेतवाराह कल्प है; (3) वैवस्वतमन्वन्तरे—चौदह मनुओं में से वर्तमान में सातवें वैवस्वत मनु का मन्वन्तर चल रहा है; (4) अष्टाविंशतितमे कलियुगे प्रथमचरणे—इस सातवें मन्वन्तर के 27 महायुग बीत चुके हैं और 28वें महायुग का सतयुग, त्रेता व द्वापर बीतकर कलियुग का पहला चरण चल रहा है (जिसके लगभग पाँच हज़ार एक सौ से अधिक वर्ष बीते हैं); (5) जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे—पौराणिक भूगोल के सप्तद्वीपों में जम्बूद्वीप के दक्षिण में स्थित हिमालय से समुद्र पर्यंत फैले भारतवर्ष में (जहाँ उत्तर भारत में आर्यावर्तान्तर्गते और दक्षिण भारत में दण्डकारप्यान्तर्गते या गोदावरी-कावेरी के सापेक्ष स्थान बोला जाता है)। इसके बाद वर्तमान संवत्सर, अयन (उत्तरायण या दक्षिणायन), ऋतु, मास, पक्ष, तिथि, वार और नक्षत्र बोलकर व्यक्ति अपने नाम और गोत्र के साथ शुभ कर्म का निश्चय करता है।

यह विशाल काल-बोध हमारे दैनिक जीवन को क्या सिखाता है?

अक्सर लोग कलियुग का नाम सुनकर निराशा या डर की बातें करने लगते हैं, किंतु शास्त्रीय काल-गणना का उद्देश्य निराशा फैलाना बिल्कुल नहीं है। जब हम यह देखते हैं कि 4 लाख 32 हज़ार वर्षों के कलियुग में अभी हम इसके एकदम शुरुआती हिस्से में हैं, और दूसरी ओर विष्णु पुराण व भागवत पुराण यह कहते हैं कि कलियुग में केवल सात्विक कर्म, सद्भाव और नाम-स्मरण से ही वह पुण्य मिल जाता है जो अन्य युगों में कठोर तपस्या से मिलता था—तो मन में उत्साह जागता है। साथ ही, अरबों वर्षों के कल्प के सामने अपनी छोटी-सी चिंता या अहंकार को रखने पर मन शांत और विनम्र हो जाता है। आप अपने शहर के आज के संकल्प-उपयोगी पंचांग (संवत्सर, अयन, ऋतु, मास, पक्ष, तिथि, वार और नक्षत्र) को देखने के लिए दैनिक पंचांग और अपनी जन्म-कुंडली की गणना के लिए मुफ़्त कुंडली टूल का उपयोग कर सकते हैं।

संकल्प और भारतीय काल-गणना के चार प्रेरणादायी सूत्र

  • किसी भी शुभ कार्य, अध्ययन या उपासना से पहले एक क्षण रुककर अपना ‘संकल्प’ स्पष्ट करें कि यह कार्य आप किस उद्देश्य और किस शांत भाव से कर रहे हैं।
  • पंचांग केवल शुभ-अशुभ देखने की पुस्तिका नहीं है, बल्कि यह सूर्य, चंद्रमा और नक्षत्रों की गति से जुड़ा जीवंत खगोलीय कैलेंडर है।
  • संकल्प मंत्र में जम्बूद्वीप, भारतवर्ष और नदियों का स्मरण हमें अपनी प्रकृति, भूगोल और पर्यावरण के प्रति कृतज्ञ रहना सिखाता है।
  • कलियुग के नाम पर भय या पलायनवाद में पड़ने के बजाय वर्तमान क्षण के सत्कर्म, ईमानदारी और करुणा को ही अपना युग-धर्म मानें।
संकल्प मंत्र वह सेतु है जो चार अरब बत्तीस करोड़ वर्षों के कल्प को आपकी हथेली में रखे एक अंजलि जल और आज के वर्तमान पल से जोड़ देता है।

प्रामाणिक पंचांग और ज्योतिषीय समझ के साथ आगे बढ़ें

पटना के उस घर में आशुतोष और मैथिली ने उस दिन पहली बार महसूस किया कि पूजा का संकल्प कोई रटी-रटाई पंक्ति नहीं, बल्कि खगोल, भूगोल और इतिहास की एक भव्य कविता है। यदि आप भी पंचांग, संवत्सर, अयन और अपनी जन्म-कुंडली की दशाओं को इसी तार्किक व शास्त्रीय स्पष्टता के साथ समझना चाहते हैं, तो Astro Ratan आपके लिए एक विश्वसनीय सहायक है। यह लाहिड़ी अयनांश और स्विस एफ़ेमेरिस के सटीक गणित से आपकी कुंडली व समय का विश्लेषण करता है। वर्तमान ग्रह-स्थिति के लिए गोचर फल, सात्विक आचरण के लिए वैदिक उपाय और भारतीय ज्योतिष की गहरी जानकारी के लिए हिंदी ज्योतिष पन्नों का अवलोकन करें।

Key takeaways

  • कलियुग की अवधि 4,32,000 सौर वर्ष है; द्वापर इसका दोगुना (8,64,000 वर्ष), त्रेता तीन गुना (12,96,000 वर्ष) और सतयुग चार गुना (17,28,000 वर्ष) होता है, जिनका कुल योग 43,20,000 वर्ष (एक महायुग) है।
  • आर्यभट और सूर्यसिद्धांत की खगोलीय परंपरा में कलियुग का आरंभ 17-18 फ़रवरी 3102 ईसा पूर्व की मध्यरात्रि से माना जाता है, जिसके आधार पर ‘कलि-अहर्गण’ और कलियुग संवत् चलता है।
  • 71 महायुगों का एक मन्वन्तर होता है और 14 मन्वन्तरों (संधिकाल सहित 1000 महायुग अर्थात् 4 अरब 32 करोड़ सौर वर्ष) का एक ‘कल्प’ होता है।
  • पूजा के ‘संकल्प मंत्र’ में व्यक्ति कल्प से लेकर अपने वर्तमान पल (तिथि-वार-नक्षत्र) तक समय के स्केल को और ब्रह्मांड से लेकर अपने शहर-घर तक भूगोल के स्केल को एक सूत्र में पिरोता है।
  • यह विशाल काल-चेतना मनुष्य को अहंकार से मुक्त करके वर्तमान क्षण के कर्तव्य के प्रति सजग और विनम्र बनाती है।

हर पूजा में बोले जाने वाले ‘श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे...’ संकल्प मंत्र का असली मतलब क्या है? 4.32 अरब साल की भारतीय काल-गणना पर यह लेख अद्भुत है!

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FAQ

सूर्यसिद्धांत और पुराणों के अनुसार सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग (चतुर्युग) की अवधि कितने वर्ष की है?

भारतीय काल-गणना में कलियुग की अवधि 4,32,000 सौर वर्ष, द्वापरयुग की 8,64,000 वर्ष, त्रेतायुग की 12,96,000 वर्ष और सतयुग की 17,28,000 वर्ष है। इन चारों युगों को मिलाकर 43,20,000 (तैंतालीस लाख बीस हज़ार) सौर वर्षों का एक चतुर्युग या महायुग बनता है।

पूजा के संकल्प मंत्र में ‘श्वेतवाराह कल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे’ का क्या अर्थ होता है?

इसका अर्थ है कि हम वर्तमान ‘श्वेतवाराह’ नामक कल्प (4.32 अरब वर्ष की अवधि) के भीतर चल रहे सातवें ‘वैवस्वत’ मन्वन्तर के अट्ठाईसवें महायुग के कलियुग के प्रथम चरण में स्थित होकर यह शुभ कर्म कर रहे हैं।

संकल्प मंत्र में ‘जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे’ क्यों बोला जाता है?

प्राचीन भारतीय भूगोल में पृथ्वी के मुख्य महाद्वीपीय भू-भाग को जम्बूद्वीप और हिमालय से हिंद महासागर तक के उपमहाद्वीप को भारतवर्ष (भरतखण्ड) कहा गया है। संकल्प में समय के साथ-साथ अपने सटीक भौगोलिक स्थान का उच्चारण करने के लिए इसे बोला जाता है।

भारतीय खगोल परंपरा में वर्तमान कलियुग का प्रारंभ कब से माना जाता है?

आर्यभट और सूर्यसिद्धांत की खगोलीय गणना के अनुसार वर्तमान कलियुग का आरंभ 17-18 फ़रवरी 3102 ईसा पूर्व की मध्यरात्रि से माना जाता है। भारतीय पंचांगों में इसी बिंदु से कलियुग संवत् (कलि-अहर्गण) की निरंतर गिनती की जाती है।

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