हिंदी / सहज हिंग्लिश
भारतीय ज्योतिष का इतिहास, प्राचीन ग्रंथ, खगोल-परंपरा और तीर्थ-विज्ञानहिंदी / सहज हिंग्लिश

चतुर्थांश (D-4) से निवास व संपत्ति और षोडशांश (D-16) से वाहन व मानसिक सुख का सूक्ष्म अध्ययन कैसे होता है?

मकान की रजिस्ट्री होना एक बात है और उस घर में चैन की नींद आना दूसरी बात—महर्षि पराशर ने चतुर्थ भाव के इन दोनों पहलुओं को समझने के लिए D-4 और D-16 के रूप में दो अलग दर्पण क्यों बनाए?

2026-10-19 9 min · 2,113 words

Direct answer

वैदिक ज्योतिष में जन्म-कुंडली के चतुर्थ भाव के दो सूक्ष्म विस्तार हैं—चतुर्थांश (D-4) और षोडशांश (D-16)। एक राशि के चार भाग (7 अंश 30 कला) से बनने वाली चतुर्थांश कुंडली भूमि, मकान, अचल संपत्ति और निवास-स्थान के स्थायित्व को दिखाती है। वहीं एक राशि के सोलह भाग (1 अंश 52 कला 30 विकला) से निर्मित षोडशांश कुंडली वाहन-सुख, भौतिक सुविधाओं के उपभोग और हृदय के वास्तविक संतोष को दर्शाती है।

इंदौर के विजयनगर का नया बंगला और राघवेंद्र की अनकही उलझन

इंदौर के विजयनगर में रहने वाले बयालीस वर्षीय आर्किटेक्ट राघवेंद्र पटवर्धन ने पिछले साल ही अपनी मेहनत की कमाई से एक सुंदर दो-मंज़िला मकान बनवाया था और घर के पोर्टिको में नई गाड़ी भी खड़ी थी। बाहर से देखने वाले हर रिश्तेदार और पड़ोसी को लगता था कि राघवेंद्र के जीवन में सुख की कोई कमी नहीं है। परंतु सच यह था कि नए घर में आने के बाद से ही कभी निर्माण-संबंधी विवाद, कभी कार्यस्थल के कारण दूसरे शहर में जाने का दबाव, तो कभी मन में अजीब-सी उदासी बनी रहती थी। वे उस घर में रहकर भी उसका सुख नहीं भोग पा रहे थे। दीपावली से पहले जब उनके ताऊजी और उज्जैन के वरिष्ठ ज्योतिष-अध्येता पंडित केशवराव पटवर्धन इंदौर आए, तो राघवेंद्र ने शाम की चाय पर अपने मन की बात कह दी—ताऊजी, मेरी कुंडली के चौथे घर में तो राजयोग बताया गया था, मकान और गाड़ी दोनों मिल भी गए, फिर मन में यह खालीपन क्यों है? केशवराव जी ने मुस्कुराते हुए कहा कि चौथा घर केवल ईंट-पत्थर का कमरा नहीं है, राघव; महर्षि पराशर ने ईंट-पत्थर के स्वामित्व के लिए चतुर्थांश (D-4) बनाया है और उस कमरे में बैठकर मिलने वाले चैन के लिए षोडशांश (D-16) की रचना की है।

संपत्ति का स्वामित्व बनाम सुख का अनुभव: पराशरी दृष्टि का मर्म

पंडित केशवराव ने राघवेंद्र की डायरी पर दो वृत्त खींचते हुए समझाया कि आधुनिक मनुष्य अक्सर ‘साधन’ और ‘सुख’ को एक ही वस्तु मान लेता है, जबकि भारतीय ज्योतिष शास्त्र ने हज़ारों वर्ष पहले इन दोनों के बीच की बारीक रेखा को पहचान लिया था। जन्म-कुंडली (D-1) का चतुर्थ भाव भूमि, भवन, माता, वाहन और हृदय के संतोष—इन सभी का सामूहिक केंद्र है। किंतु जीवन में हम रोज़ देखते हैं कि किसी व्यक्ति के नाम पर तीन मकान हैं, पर वह नौकरी या विवाद के कारण किराए के कमरे में रहता है; वहीं किसी दूसरे व्यक्ति के पास छोटा-सा घर है, पर उसके आँगन में हँसी और गहरा संतोष है। इसी भेद को स्पष्ट करने के लिए षोडशवर्ग में दो अलग सूक्ष्म कुंडलियाँ निर्धारित की गईं: पहली चतुर्थांश (जिसे तुर्यांश भी कहते हैं), जो अचल संपत्ति, निवास-स्थान के बदलाव और संचित भाग्य की थाह लेती है; और दूसरी षोडशांश (जिसे कलांश या नृपांश कहते हैं), जो वाहन, सुख-सुविधा के उपकरणों और सबसे बढ़कर हृदय के भीतरी आनंद की जाँच करती है।

चतुर्थांश (D-4) कुंडली का गणित और अचल संपत्ति का विचार

बृहत् पाराशर होरा शास्त्र के अनुसार जब तीस अंश की एक राशि को चार बराबर भागों में बाँटा जाता है, तो प्रत्येक भाग 7 अंश 30 कला का होता है। इसे चतुर्थांश या तुर्यांश कहते हैं। इसकी गणना का सिद्धांत केंद्र-आधारित और अत्यंत सुगठित है: किसी भी राशि का प्रथम चतुर्थांश (0 अंश से 7 अंश 30 कला) उसी राशि में रहता है; द्वितीय चतुर्थांश (7 अंश 30 कला से 15 अंश) उस राशि से चौथी राशि में जाता है; तृतीय चतुर्थांश (15 अंश से 22 अंश 30 कला) उस राशि से सातवीं राशि में पड़ता है; और चतुर्थ भाग (22 अंश 30 कला से 30 अंश) उस राशि से दसवीं राशि में स्थित होता है। शास्त्रों में इन चारों भागों के अधिष्ठाता ब्रह्मा के चारों मानस-पुत्र—सनक, सनंदन, सनातन और सनत्कुमार—माने गए हैं। चतुर्थांश कुंडली में लग्नेश, चतुर्थेश और भूमि-कारक मंगल की स्थिति से यह देखा जाता है कि व्यक्ति को पैतृक या स्वार्जित भूमि-भवन का सुख किस प्रकार मिलेगा, तथा राहु, शनि या द्वादशेश के प्रभाव से क्या उसे आजीविका के लिए जन्मस्थान से दूर जाकर बसना पड़ेगा। अपनी कुंडली के चतुर्थांश और षोडशांश के ग्रह-स्पष्ट आप मुफ़्त कुंडली टूल पर तुरंत देख सकते हैं।

षोडशांश (D-16) कुंडली: चंद्रमा की सोलह कलाएँ और हृदय का संतोष

जैसे चंद्रमा सोलह कलाओं से पूर्ण होकर शीतल चाँदनी बिखेरता है, वैसे ही चतुर्थ भाव के सुख की पूर्णता को देखने के लिए राशि को सोलह सूक्ष्म भागों में बाँटा जाता है। तीस अंश को सोलह से भाग देने पर प्रत्येक षोडशांश 1 अंश 52 कला 30 विकला का होता है। इसीलिए इसे ‘कलांश’ भी कहा जाता है। इसकी गणना राशि के स्वभाव (चर, स्थिर, द्विस्वभाव) के अनुसार त्रिकोण के नियम से चलती है: यदि ग्रह चर राशि (मेष, कर्क, तुला, मकर) में हो, तो उसके सोलह भागों की गणना मेष राशि से क्रमशः आरंभ होती है; यदि ग्रह स्थिर राशि (वृषभ, सिंह, वृश्चिक, कुंभ) में हो, तो गणना सिंह राशि से शुरू होती है; और यदि ग्रह द्विस्वभाव राशि (मिथुन, कन्या, धनु, मीन) में हो, तो गिनती धनु राशि से आरंभ की जाती है। इसके अधिष्ठाता देवता ब्रह्मा, विष्णु, शिव और सूर्य हैं, जो सोलह भागों में चार बार आवृत्त होते हैं। षोडशांश में शुक्र (वाहन और सौंदर्यपूर्ण वैभव का कारक) तथा चंद्रमा (मन की शांति और भावनात्मक तृप्ति का कारक) की स्थिति सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है।

चतुर्थांश (D-4) और षोडशांश (D-16) का शास्त्रीय अंतर

विश्लेषण का बिंदुचतुर्थांश / तुर्यांश (D-4)षोडशांश / कलांश (D-16)
प्रत्येक भाग का विस्तार7 अंश 30 कला (एक राशि के 4 भाग)1 अंश 52 कला 30 विकला (एक राशि के 16 भाग)
गणना की पद्धतिउसी राशि से 1, 4, 7 और 10वीं (केंद्र) राशियों मेंचर में मेष से, स्थिर में सिंह से, द्विस्वभाव में धनु से क्रमशः
अधिष्ठाता देवतासनक, सनंदन, सनातन और सनत्कुमारब्रह्मा, विष्णु, शिव और सूर्य (चार आवृत्तियों में)
मुख्य जीवन-क्षेत्रभूमि, मकान, अचल संपत्ति, निवास-परिवर्तन और गृह-स्थायित्ववाहन-सुख, भौतिक सुविधाएँ, कला-प्रेम और आंतरिक मानसिक संतोष
प्रमुख नैसर्गिक कारकमंगल (भूमि), शनि (निर्माण/स्थायित्व) और चतुर्थेशशुक्र (वाहन व वैभव), चंद्रमा (मन का चैन) और चतुर्थेश

राघवेंद्र की कुंडली में छिपा सूत्र: जब D-4 बलवान हो पर D-16 पीड़ित

जब पंडित केशवराव ने राघवेंद्र की दोनों वर्ग कुंडलियाँ खोलीं, तो पहेली अपने आप सुलझ गई। राघवेंद्र की चतुर्थांश (D-4) कुंडली में चतुर्थेश और मंगल अत्यंत बलवान होकर केंद्र में बैठे थे, जिसने उन्हें भव्य मकान बनाने का सामर्थ्य और भूमि-स्वामित्व तो सहज ही दिला दिया। किंतु उनकी षोडशांश (D-16) कुंडली में लग्न पर केतु और चंद्रमा पर शनि का प्रभाव था, तथा वर्तमान अंतर्दशा भी षोडशांश के अष्टमेश की चल रही थी। इसका अर्थ यह था कि संपत्ति के काग़ज़ात और दीवारें तो मज़बूत थीं, पर मन अत्यधिक कार्य-दबाव और पूर्णतावाद (perfectionism) के कारण घर के सुख को महसूस नहीं कर पा रहा था। इसी तरह कई बार किसी व्यक्ति के D-16 में शुक्र यदि छठे या आठवें भाव में पीड़ित हो, तो महँगी गाड़ी ख़रीदने के बाद भी बार-बार यांत्रिक खराबी या रखरखाव की उलझन बनी रहती है। भारतीय ज्योतिष के ऐसे सूक्ष्म सिद्धांतों को और स्पष्ट रूप से समझने के लिए हिंदी ज्योतिष के शास्त्रीय लेखों का संदर्भ लिया जा सकता है।

सुख को केवल वस्तुओं में न खोजें: पराशरी दर्शन का व्यावहारिक संदेश

चतुर्थांश और षोडशांश का यह विभाजन हमें एक बहुत गहरी जीवन-दृष्टि देता है। महर्षि पराशर ने षोडशांश के अधिष्ठाताओं में ब्रह्मा (सृजन), विष्णु (पालन), शिव (वैराग्य व शांति) और सूर्य (आत्म-प्रकाश) को रखकर यह संकेत दिया है कि सच्चा सुख केवल वस्तुओं के ढेर से नहीं आता, बल्कि मन के संतुलन से आता है। यदि किसी की कुंडली में D-16 का चंद्रमा या शुक्र थोड़ा कमज़ोर भी हो, तो इसका यह अर्थ नहीं कि उसे जीवन भर बेचैन रहना है; इसका संकेत यह है कि उसे अपने घर के वातावरण को सादगीपूर्ण, कलह-मुक्त और कृतज्ञता से भरा रखने का सचेत प्रयास करना चाहिए। घर में प्राकृतिक प्रकाश, हरी वनस्पति, शांत संवाद और परिवार के साथ बिना फ़ोन के बिताया गया आधा घंटा चंद्रमा और शुक्र के तत्व को भीतर से मज़बूत करता है। गृह-शांति और सात्विक जीवनशैली से जुड़े पारंपरिक सुझावों के लिए वैदिक उपाय का अवलोकन भी किया जा सकता है।

D-4 और D-16 का अध्ययन करते समय उपयोगी व्यावहारिक सावधानियाँ

  • जन्म-समय की सटीकता परखें: षोडशांश (D-16) का प्रत्येक भाग दो अंश से भी कम (1 अंश 52 कला 30 विकला) का होता है, इसलिए जन्म-समय में 5–7 मिनट का अंतर भी D-16 का लग्न बदल सकता है।
  • दशा और गोचर के साथ समय चुनें: भूमि या वाहन ख़रीदते समय केवल वर्ग कुंडली ही नहीं, वर्तमान महादशा-अंतर्दशा और गोचर फल तथा शुभ मुहूर्त के लिए दैनिक पंचांग का समन्वय करें।
  • ऋण-जाल से बचें: यदि चतुर्थांश या षोडशांश में षष्ठेश (ऋण भाव का स्वामी) का संबंध चतुर्थेश से बन रहा हो, तो दिखावे के लिए अपनी क्षमता से अधिक क़र्ज़ लेकर मकान या महँगा वाहन लेने से बचें।
  • तकनीकी और क़ानूनी जाँच को न टालें: कुंडली में कितना भी शुभ योग हो, ज़मीन के काग़ज़ात की क़ानूनी जाँच और वाहन की सुरक्षा-परख व्यावहारिक स्तर पर अनिवार्य है।
चतुर्थांश (D-4) यह बताता है कि आपके नाम पर कितनी छत और कितनी भूमि लिखी है; षोडशांश (D-16) यह बताता है कि उस छत के नीचे बैठकर आपके हृदय को कितनी शांति मिलती है।

अंश-शुद्ध गणना और विजयनगर के आँगन में लौटी सहजता

क्योंकि षोडशांश कुंडली में एक अंश बावन कला का सूक्ष्म विभाजन होता है, इसलिए सामान्य अंदाज़े से इसकी गणना करना कठिन होता है। Astro Ratan लाहिड़ी अयनांश और उच्च-सटीकता वाले खगोलीय गणित की सहायता से आपकी लग्न कुंडली के साथ चतुर्थांश (D-4) और षोडशांश (D-16) की सटीक स्थिति की गणना करता है, ताकि आप अपनी संपत्ति, निवास और मानसिक संतोष से जुड़े प्रश्नों को बिना किसी भ्रम के समझ सकें। उज्जैन लौटने से पहले ताऊजी ने राघवेंद्र को समझाया कि वह घर के छोटे-मोटे वास्तु या डिज़ाइन के बदलावों में उलझना छोड़कर हर शाम आँगन में परिवार के साथ बैठना शुरू करे और काम का बोझ दफ़्तर में ही छोड़ आए। कुछ ही हफ़्तों में राघवेंद्र ने महसूस किया कि मकान वही था, गाड़ी भी वही थी, पर जब भीतर की अपेक्षा शांत हुई तो विजयनगर का वह नया घर सचमुच ‘घर’ लगने लगा।

Key takeaways

  • चतुर्थ भाव से देखे जाने वाले विषयों को महर्षि पराशर ने दो स्तरों पर बाँटा है: बाहरी अचल संपत्ति के लिए चतुर्थांश (D-4) और आंतरिक सुख व वाहन-वैभव के लिए षोडशांश (D-16)।
  • चतुर्थांश (तुर्यांश) में प्रत्येक राशि के 7 अंश 30 कला के चार भाग होते हैं, जिनकी गणना उसी राशि से प्रथम, चतुर्थ, सप्तम और दशम (केंद्र) राशियों में होती है।
  • षोडशांश (कलांश) में प्रत्येक राशि के 1 अंश 52 कला 30 विकला के सोलह भाग होते हैं; चर राशियों में मेष से, स्थिर में सिंह से और द्विस्वभाव में धनु से इसकी गिनती चलती है।
  • D-4 में मंगल और चतुर्थेश की मज़बूती भूमि व भवन का स्वामित्व देती है, जबकि D-16 में शुक्र और चंद्रमा की शुभता उन साधनों का आनंद लेने की मानसिक शांति देती है।
  • संपत्ति या वाहन ख़रीदने का निर्णय लेते समय कुंडली के संकेतों के साथ अपनी वित्तीय क्षमता, ऋण-भार और पारिवारिक आवश्यकता का व्यावहारिक आकलन सर्वोपरि है।

मकान होना अलग बात है और घर में सुख मिलना अलग बात—जानिए चतुर्थांश (D-4) और षोडशांश (D-16) कुंडली का यह गहरा पराशरी अंतर।

जानना चाहते हैं कि आपकी कुंडली के चतुर्थांश (D-4) और षोडशांश (D-16) में भूमि, भवन और मानसिक सुख के ग्रह किस अवस्था में हैं? Astro Ratan पर अपनी सूक्ष्म वर्ग कुंडली देखें।

FAQ

चतुर्थांश (D-4) और षोडशांश (D-16) कुंडली के विषय में मुख्य अंतर क्या है?

चतुर्थांश (D-4) मुख्य रूप से अचल संपत्ति, भूमि, भवन के स्वामित्व और निवास-स्थान के स्थायित्व या परिवर्तन को दिखाता है। इसके विपरीत षोडशांश (D-16) वाहन-सुख, भौतिक सुविधाओं के वास्तविक उपभोग और मन के भीतरी संतोष व आनंद को दर्शाता है।

षोडशांश (D-16) कुंडली की गणना चर, स्थिर और द्विस्वभाव राशियों में कैसे होती है?

बृहत् पाराशर होरा शास्त्र के अनुसार एक राशि के 16 बराबर भाग (प्रत्येक 1 अंश 52 कला 30 विकला) किए जाते हैं। यदि ग्रह चर राशि में हो तो गणना मेष से, स्थिर राशि में हो तो सिंह से, और द्विस्वभाव राशि में हो तो धनु राशि से क्रमशः आगे की राशियों में की जाती है।

चतुर्थांश (D-4) कुंडली से स्थान-परिवर्तन या विदेश-निवास कैसे देखा जाता है?

यदि लग्न कुंडली और चतुर्थांश (D-4) दोनों में चतुर्थ भाव या चतुर्थेश का संबंध तृतीय, नवम या द्वादश भाव से हो तथा उस पर राहु, शनि या चर राशियों का प्रबल प्रभाव हो, तो व्यक्ति को आजीविका या उन्नति के लिए अपने जन्मस्थान से दूर जाकर बसने के अवसर मिलते हैं।

वाहन-सुख के लिए षोडशांश (D-16) में किन ग्रहों की स्थिति सबसे महत्वपूर्ण होती है?

षोडशांश कुंडली में लग्न और चतुर्थ भाव के साथ-साथ वाहन के नैसर्गिक कारक शुक्र तथा मन के कारक चंद्रमा की स्थिति सबसे अहम होती है। D-16 में शुक्र और चतुर्थेश का शुभ संबंध सुरक्षित, सुखद और निर्विघ्न वाहन-सुख का संकेत देता है।

Related