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होरा (D-2) से आर्थिक स्वभाव और द्रेष्काण (D-3) से साहस व भाई-बहनों के सहयोग को कैसे देखा जाता है?

बृहत् पराशर होरा शास्त्र के षोडशवर्ग में तीस अंश की राशि के दो भाग करने वाली होरा कुंडली (सूर्य व चंद्र होरा) और तीन भाग करने वाली द्रेष्काण कुंडली (नारद, अगस्त्य व दुर्वासा द्रेष्काण) के शास्त्रीय गणित को सरल भाषा में समझिए।

2026-10-19 9 min · 2,025 words

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वैदिक ज्योतिष के वर्ग-चक्र (षोडशवर्ग) में जन्म-कुंडली (D-1) के बाद ‘होरा’ (D-2) और ‘द्रेष्काण’ (D-3) सबसे महत्वपूर्ण प्रारंभिक सूक्ष्म कुंडलियाँ हैं। तीस अंश की प्रत्येक राशि को पंद्रह-पंद्रह अंश के दो भागों में बाँटने से होरा कुंडली (D-2) बनती है, जो सूर्य और चंद्र की होरा के माध्यम से व्यक्ति के आर्थिक स्वभाव, वाणी और संसाधन-प्रबंधन को दर्शाती है। वहीं राशि को दस-दस अंश के तीन भागों में बाँटने से द्रेष्काण कुंडली (D-3) बनती है, जिससे साहस, पहल करने की क्षमता और भाई-बहनों व सहयोगियों के साथ तालमेल देखा जाता है।

देहरादून के राजपुर रोड पर दो भाइयों का साझा काम और दो अलग स्वभाव

अक्टूबर की एक ठंडी सुबह देहरादून के राजपुर रोड पर अपने नए बुक-कैफ़े में अट्ठाईस वर्षीय सिद्धार्थ और पच्चीस वर्षीय उत्कर्ष बहुगुणा महीने भर के हिसाब-किताब पर चर्चा कर रहे थे। दोनों सगे भाई हैं और दोनों की मुख्य जन्म-कुंडली (लग्न कुंडली) में धनु लग्न और दूसरे भाव में मकर राशि का गुरु दिखता है। फिर भी सिद्धार्थ का स्वभाव हर आर्थिक निर्णय को अपने बल पर ठोस योजना से लेने का है, जबकि उत्कर्ष लोगों से तुरंत घुल-मिलकर नए ग्राहकों को जोड़ने और जोखिम उठाकर नए प्रयोग करने में आगे रहता है। उसी शाम उनके पिता के मित्र और सेवानिवृत्त संस्कृत प्राध्यापक पंडित हरीश चंद्र नौटियाल कैफ़े में आए। जब दोनों भाइयों ने यह बात पूछी, तो पंडित जी ने मुस्कुराते हुए कहा कि जन्म-कुंडली की एक राशि तीस अंश चौड़ी होती है—जब हम उसे सूक्ष्म लेंस से पंद्रह-पंद्रह अंश की ‘होरा’ (D-2) और दस-दस अंश के ‘द्रेष्काण’ (D-3) में बाँटते हैं, तब पता चलता है कि एक ही राशि में बैठे ग्रह के भीतर काम करने की ऊर्जा कैसे बदल जाती है।

वर्ग-कुंडली (षोडशवर्ग) की आवश्यकता क्यों पड़ी?

वैदिक ज्योतिष में लग्न कुंडली (D-1) पूरे जीवन का मूल वृक्ष है, किंतु एक राशि आकाश में तीस अंश (30 डिग्री) तक फैली होती है और लग्न लगभग दो घंटे तक एक ही राशि में रहता है। उन दो घंटों में जन्म लेने वाले सभी लोगों का आर्थिक दृष्टिकोण, भाई-बहनों से संबंध या कार्य करने का साहस एक जैसा नहीं हो सकता। इसी सूक्ष्म अंतर को पकड़ने के लिए महर्षि पराशर ने बृहत् पराशर होरा शास्त्र के षोडशवर्गाध्याय में राशि के सूक्ष्म विभाजन (डिवीजनल चार्ट्स) की प्रणाली दी। जैसे जन्म-कुंडली के दूसरे भाव से धन व वाणी और तीसरे भाव से पराक्रम व छोटे भाई-बहन देखे जाते हैं, ठीक उसी क्रम में दूसरे वर्ग ‘होरा’ (D-2) को आर्थिक व संसाधन-प्रबंधन के लिए और तीसरे वर्ग ‘द्रेष्काण’ (D-3) को साहस, उद्यम तथा सहोदर सुख के लिए समर्पित किया गया।

होरा कुंडली (D-2): अहोरात्र से जन्मा सूर्य और चंद्र का संतुलन

संस्कृत में ‘अहोरात्र’ (दिन और रात) शब्द के पहले और अंतिम अक्षर को हटाने से ‘होरा’ शब्द बना है। दिन का स्वामी सूर्य है और रात्रि का स्वामी चंद्रमा। इसीलिए महर्षि पराशर ने तीस अंश की प्रत्येक राशि को पंद्रह-पंद्रह अंश (0° से 15° और 15° से 30°) के दो बराबर भागों में बाँटा और उनके स्वामित्व केवल प्रकाश देने वाले दो मुख्य ग्रहों—सूर्य (सिंह राशि, अंक 5) और चंद्रमा (कर्क राशि, अंक 4)—को सौंपे। इसका गणित अत्यंत रोचक और वैज्ञानिक है: विषम राशियों (मेष-1, मिथुन-3, सिंह-5, तुला-7, धनु-9, कुंभ-11) में पहले पंद्रह अंश (0°-15°) पर सूर्य की होरा होती है और दूसरे पंद्रह अंश (15°-30°) पर चंद्रमा की होरा होती है। वहीं सम राशियों (वृषभ-2, कन्या-6, वृश्चिक-8, मकर-10, मीन-12 व कर्क-4) में पहले पंद्रह अंश पर चंद्रमा की होरा और बाद के पंद्रह अंश पर सूर्य की होरा होती है। इस प्रकार होरा कुंडली (D-2) में सभी नौ ग्रह केवल दो ही घरों—सिंह (सूर्य की होरा) या कर्क (चंद्र की होरा)—में एकत्रित दिखाई देते हैं।

सूर्य और चंद्र की होरा से आर्थिक स्वभाव कैसे समझें?

पराशर के अनुसार सूर्य की होरा में सूर्य, मंगल और गुरु (अग्नि व पुरुष प्रधान ग्रह) अधिक सहज और बलवान माने गए हैं, जबकि चंद्रमा की होरा में चंद्रमा, शुक्र और सौम्य बुध अधिक अनुकूल फल देते हैं; शनि दोनों में तटस्थ श्रम का प्रतीक है। जिस व्यक्ति की कुंडली में लग्न और धनेश सूर्य की होरा में हों, वह अपने आर्थिक जीवन में आत्मनिर्भरता, स्व-अर्जित प्रयास, प्रशासनिक अनुशासन और स्पष्ट निर्णय से आगे बढ़ना पसंद करता है। इसके विपरीत, जिसके प्रमुख ग्रह चंद्रमा की होरा में अधिक हों, वह जनसंपर्क, सेवा, कला, व्यापारिक लचीलेपन और टीम के सहयोग से संसाधन जुटाने में कुशल होता है। यह धन की मात्रा की कोई जादुई भविष्यवाणी नहीं, बल्कि यह समझने का दर्पण है कि व्यक्ति किस कार्य-शैली में आर्थिक रूप से अधिक सहज महसूस करेगा।

होरा (D-2) और द्रेष्काण (D-3) कुंडली का शास्त्रीय ढाँचा

वर्ग कुंडली का नामराशि (30°) का विभाजनअधिपति / स्वामी का नियम (पराशर)मुख्य जीवन-संदर्भ व व्यावहारिक उपयोग
होरा (D-2) — विषम राशि2 भाग (15° प्रत्येक)0°-15°: सूर्य की होरा (सिंह); 15°-30°: चंद्र की होरा (कर्क)आर्थिक दृष्टिकोण, स्व-परिश्रम बनाम लोक-सहयोग से संसाधन प्रबंधन
होरा (D-2) — सम राशि2 भाग (15° प्रत्येक)0°-15°: चंद्र की होरा (कर्क); 15°-30°: सूर्य की होरा (सिंह)वाणी की सौम्यता, बचत की प्रवृत्ति और तरल संपत्ति का संतुलन
द्रेष्काण (D-3) — प्रथम भाग0° से 10° (पहला तिहाई)उसी राशि का स्वामी (धर्म त्रिकोण का प्रथम बिंदु) — देवर्षि नारदसंवाद, भ्रमण, जिज्ञासा और सहयोगात्मक तरीके से पहल करने का साहस
द्रेष्काण (D-3) — द्वितीय व तृतीय भाग10° से 20° तथा 20° से 30°10°-20°: पंचम राशि का स्वामी (अगस्त्य); 20°-30°: नवम राशि का स्वामी (दुर्वासा)द्वितीय में गंभीर संकल्प व धैर्य; तृतीय में तीक्ष्ण ऊर्जा, आत्मरक्षा व त्वरित निर्णय

द्रेष्काण कुंडली (D-3): त्रिकोण का नियम और तीन ऋषियों का प्रतीक

तीस अंश की एक राशि को दस-दस अंश (0°-10°, 10°-20°, 20°-30°) के तीन बराबर भागों में बाँटने पर प्रत्येक भाग को ‘द्रेष्काण’ या ‘द्रेक्काण’ कहा जाता है। चूँकि बारह राशियों के तीन-तीन भाग होते हैं, इसलिए पूरे भचक्र में कुल छत्तीस द्रेष्काण बनते हैं (जिनका विशद कलात्मक वर्णन वराहमिहिर ने बृहज्जातक के द्रेष्काण-अध्याय में भी किया है)। पराशर पद्धति में द्रेष्काण का गणित त्रिकोण (1, 5, 9) पर आधारित है: किसी भी राशि के पहले द्रेष्काण (0°-10°) में स्थित ग्रह उसी राशि में रहता है; दूसरे द्रेष्काण (10°-20°) में स्थित ग्रह उस राशि से पाँचवीं राशि में जाता है; और तीसरे द्रेष्काण (20°-30°) में स्थित ग्रह उस राशि से नौवीं राशि में जाता है। उदाहरण के लिए, यदि मंगल मेष राशि के 14 अंश पर है, तो वह दूसरे द्रेष्काण में होने के कारण D-3 कुंडली में मेष से पाँचवीं राशि सिंह में चला जाएगा। शास्त्रों में प्रथम द्रेष्काण के ऋषि नारद (संवाद और गतिशीलता के प्रतीक), द्वितीय द्रेष्काण के ऋषि अगस्त्य (गंभीर साधना और समुद्र-मंथन जैसे अटल धैर्य के प्रतीक) तथा तृतीय द्रेष्काण के ऋषि दुर्वासा (तीव्र तेज, अनुशासन और अन्याय के विरुद्ध मुखरता के प्रतीक) माने गए हैं।

D-3 से साहस और भाई-बहनों के सहयोग को कैसे देखा जाता है?

जिस प्रकार जन्म-कुंडली (D-1) में तीसरा भाव और मंगल पराक्रम तथा सहोदरों (भाई-बहनों व करीबी सहकर्मियों) के कारक हैं, उसी प्रकार D-3 कुंडली में लग्न, तृतीयेश और मंगल की स्थिति यह बताती है कि व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में किस प्रकार कदम उठाता है। यदि D-1 में तीसरे भाव का स्वामी साधारण दिख रहा हो, किंतु D-3 में वह अपनी स्वराशि, मित्र राशि या केंद्र-त्रिकोण में बली हो, तो जीवन के निर्णायक मोड़ पर व्यक्ति के भीतर अद्भुत साहस जागता है और भाई-बहनों या मित्रों से समय पर ठोस सहयोग मिलता है। आप अपनी जन्म-कुंडली और ग्रहों के सटीक अंश देखने के लिए मुफ़्त कुंडली टूल तथा दैनिक शुभ समय और होरा जानने के लिए दैनिक पंचांग की सहायता ले सकते हैं।

होरा और द्रेष्काण कुंडली देखते समय चार व्यावहारिक सूत्र

  • किसी भी वर्ग-कुंडली (D-2 या D-3) को कभी भी मूल लग्न कुंडली (D-1) से अलग करके स्वतंत्र रूप से न पढ़ें; वर्ग-कुंडली मूल वृक्ष की शाखा मात्र है।
  • पंचांग की ‘दिन की चौबीस होरा’ (एक-एक घंटे का समय-चक्र) और कुंडली की ‘पंद्रह अंश वाली होरा (D-2)’ दो अलग-अलग अवधारणाएँ हैं; दोनों के अंतर को स्पष्ट रखें।
  • भाई-बहनों या साझेदारों के साथ संबंध केवल कुंडली के खानों से नहीं, बल्कि आपसी सम्मान, पारदर्शी हिसाब-किताब और संवाद से मजबूत होते हैं।
  • चूँकि होरा 15 अंश पर और द्रेष्काण 10 अंश पर बदल जाता है, इसलिए सीमांत अंशों (जैसे 9°55' या 14°58') पर जन्म-समय की सटीकता का विशेष ध्यान रखें।
लग्न कुंडली बताती है कि आपके पास कौन-से बीज हैं; होरा (D-2) बताती है कि आप उन्हें किस मिट्टी में सींचते हैं और द्रेष्काण (D-3) बताता है कि आप कितनी लगन और साहस से उनकी देखभाल करते हैं।

सूक्ष्म ज्योतिषीय गणित और स्पष्ट समझ

देहरादून के उस कैफ़े में सिद्धार्थ और उत्कर्ष ने जब पंडित नौटियाल जी से समझा कि उनके ग्रहों के अंश अलग-अलग द्रेष्काण और होरा में होने के कारण ही एक भाई प्रबंधन में कुशल है और दूसरा जनसंपर्क में, तो उन्होंने एक-दूसरे की कार्य-शैली का सम्मान करते हुए जिम्मेदारियाँ बाँट लीं। यदि आप भी अपनी जन्म-कुंडली के ग्रहों के सटीक अंशों, उनकी होरा और द्रेष्काण स्थिति तथा चल रही दशा को बिना किसी भ्रम के समझना चाहते हैं, तो Astro Ratan आपके लिए एक प्रामाणिक वैदिक मार्गदर्शक है। यह लाहिड़ी अयनांश और स्विस एफ़ेमेरिस के सूक्ष्म गणित पर कार्य करता है। आप अपने वर्तमान गोचर को गोचर फल पर, सात्विक सुझावों को वैदिक उपाय पर और शास्त्रीय ज्योतिष के अन्य लेखों को हिंदी ज्योतिष पर पढ़ सकते हैं।

Key takeaways

  • महर्षि पराशर के षोडशवर्ग (16 वर्ग कुंडलियों) में जन्म-राशि चक्र (D-1) से शरीर व समग्र जीवन, होरा (D-2) से धन-संपदा का स्वभाव और द्रेष्काण (D-3) से पराक्रम व सहोदर (भाई-बहन) का विचार किया जाता है।
  • होरा (D-2) में प्रत्येक 30 अंश की राशि को 15-15 अंश के दो भागों में बाँटा जाता है; विषम राशियों में प्रथम भाग सूर्य (सिंह) की होरा और द्वितीय भाग चंद्रमा (कर्क) की होरा होता है, जबकि सम राशियों में यह क्रम उलट जाता है।
  • सूर्य की होरा स्व-अर्जित उद्यम, नेतृत्व और दृढ़ता दिखाती है, जबकि चंद्रमा की होरा लोक-व्यवहार, तरल संसाधनों और सहज सहयोग को दर्शाती है।
  • द्रेष्काण (D-3) में 30 अंश की राशि को 10-10 अंश के तीन भागों में बाँटा जाता है, जिनके स्वामी क्रमशः वही राशि, उससे पंचम राशि और उससे नवम राशि के स्वामी होते हैं।
  • प्रथम, द्वितीय और तृतीय द्रेष्काण के संरक्षक ऋषि क्रमशः नारद, अगस्त्य और दुर्वासा माने गए हैं, जो व्यक्ति के कार्य करने की शैली का सूक्ष्म संकेत देते हैं।

लग्न कुंडली (D-1) तो सब देखते हैं, लेकिन धन के स्वभाव के लिए ‘होरा (D-2)’ और साहस व भाई-बहनों के लिए ‘द्रेष्काण (D-3)’ कैसे बनती है? पराशर के षोडशवर्ग पर यह लेख बहुत सरल और उपयोगी है।

अपनी जन्म-कुंडली के ग्रहों के सटीक अंशों के साथ यह जानना चाहते हैं कि होरा (D-2) और द्रेष्काण (D-3) में आपके संसाधन और साहस का बल कैसा है? Astro Ratan से पूछिए।

FAQ

होरा कुंडली (D-2) में विषम और सम राशियों में सूर्य और चंद्र की होरा कैसे तय होती है?

महर्षि पराशर के अनुसार तीस अंश की प्रत्येक राशि को 15-15 अंश के दो भागों में बाँटा जाता है। विषम राशियों (मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, कुंभ) में प्रथम 15 अंश सूर्य (सिंह) की होरा और अंतिम 15 अंश चंद्रमा (कर्क) की होरा होते हैं। सम राशियों (वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर, मीन) में प्रथम 15 अंश चंद्रमा की और अंतिम 15 अंश सूर्य की होरा होते हैं।

द्रेष्काण कुंडली (D-3) में दस-दस अंश के तीन भागों के स्वामी कौन होते हैं?

पराशर पद्धति में किसी भी राशि के प्रथम द्रेष्काण (0° से 10°) का स्वामी स्वयं वही राशि होती है; द्वितीय द्रेष्काण (10° से 20°) का स्वामी उस राशि से पंचम राशि होती है; और तृतीय द्रेष्काण (20° से 30°) का स्वामी उस राशि से नवम राशि होती है।

नारद, अगस्त्य और दुर्वासा द्रेष्काण का क्या शास्त्रीय अर्थ है?

प्रत्येक राशि के पहले द्रेष्काण के ऋषि देवर्षि नारद माने गए हैं जो संवाद और गतिशीलता दर्शाते हैं; दूसरे द्रेष्काण के ऋषि महर्षि अगस्त्य हैं जो धैर्य और गंभीर संकल्प के प्रतीक हैं; तथा तीसरे द्रेष्काण के ऋषि महर्षि दुर्वासा हैं जो तीव्र ऊर्जा और दृढ़ अनुशासन का संकेत देते हैं।

क्या होरा (D-2) और द्रेष्काण (D-3) को लग्न कुंडली (D-1) के बिना अकेले पढ़ा जा सकता है?

नहीं, वैदिक ज्योतिष में कोई भी वर्ग-कुंडली मूल जन्म-कुंडली (D-1) का पूरक और सूक्ष्म विस्तार होती है। पहले लग्न कुंडली में दूसरे व तीसरे भाव और उनके स्वामियों की स्थिति देखी जाती है, और फिर उनकी पुष्टि व सूक्ष्म बल जानने के लिए D-2 और D-3 का अध्ययन किया जाता है।

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