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भारतीय ज्योतिष का इतिहास, प्राचीन ग्रंथ, खगोल-परंपरा और तीर्थ-विज्ञानहिंदी / सहज हिंग्लिश

काशी की विद्वत् परंपरा, विश्वनाथ गली के पंचांगकार और प्रयागराज के त्रिवेणी संगम पर माघ/कुंभ की खगोलीय गणना

काशी के पंचांगकार सदियों से व्रत-पर्वों का निर्णय कैसे करते आए हैं, और बृहस्पति, सूर्य व चंद्रमा की किस विशेष राशि-स्थिति से प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक के कुंभ महापर्व तय होते हैं?

2026-10-19 9 min · 2,128 words

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काशी (वाराणसी) सदियों से उत्तर भारत में सिद्धांत-ज्योतिष, धर्मशास्त्र और पंचांग-गणना (जैसे गणेश दैवज्ञ के ‘ग्रहलाघव’, बापूदेव शास्त्री व सुधाकर द्विवेदी की परंपरा तथा काशी के प्रतिष्ठित पंचांगों) का सर्वोच्च केंद्र रही है। इसी पंचांग-गणना के आधार पर प्रयागराज के त्रिवेणी संगम सहित हरिद्वार, उज्जैन और नासिक के कुंभ महापर्वों का समय आकाश में बृहस्पति (गुरु), सूर्य और चंद्रमा के विशेष राशि-गोचर से निर्धारित होता है।

प्रयागराज के दारागंज में माघ की सुबह और पंचांग की चौकी

जनवरी की सर्द सुबह में प्रयागराज के दारागंज घाट के पास गंगा और यमुना के संगम से उठती धुंध धीरे-धीरे छँट रही थी। पचहत्तर वर्षीय पंडित त्रिलोकीनाथ शुक्ल अपने पुश्तैनी बरामदे में तख़्त पर बैठकर काशी से आए लंबे आकार के पारंपरिक पंचांग के पन्ने पलट रहे थे। उनका भतीजा सिद्धार्थ, जो इलाहाबाद विश्वविद्यालय में गणित का शोध-छात्र है, हाथ में कुल्हड़ की चाय लिए उनके पास आकर बैठा। सिद्धार्थ ने संगम की ओर जाते कल्पवासियों की कतार को देखकर पूछा, ‘बड़े पापा, दुनिया का इतना बड़ा मानव-समागम—माघ मेला और कुंभ महापर्व—न किसी सरकारी निमंत्रण से बुलाया जाता है और न किसी कैलेंडर की फिक्स अंग्रेजी तारीख़ से। फिर करोड़ों लोगों को साल भर पहले कैसे पता चल जाता है कि किस साल कुंभ प्रयागराज में होगा, किस साल हरिद्वार में और किस साल उज्जैन या नासिक में? और इसमें काशी के पंचांगकारों की क्या भूमिका होती है?’ पंडित त्रिलोकीनाथ जी ने पंचांग की लाल स्याही से छपी ग्रह-सारणी पर उँगली रखी और बोले, ‘सिद्धार्थ, संगम की रेत पर जो तंबुओं का नगर बसता है, उसका नक्शा धरती पर नहीं, आकाश में बृहस्पति और सूर्य की चाल से खींचा जाता है, और उस आकाशीय नक्शे को पढ़ने वाली सबसे बड़ी पाठशाला रही है—काशी!’

काशी की ज्योतिष-परंपरा: कमलाकर भट्ट से बापूदेव शास्त्री और सुधाकर द्विवेदी तक

पंडित त्रिलोकीनाथ जी ने सिद्धार्थ को पहले काशी की उस महान विद्वत् परंपरा का परिचय दिया जिसने सदियों तक भारतीय पंचांग और खगोल-गणित की मशाल जलाए रखी। सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी में जब महाराष्ट्र और गुजरात से अनेक विद्वान परिवार काशी आकर बसे, तो विश्वनाथ गली, ब्रह्माघाट और रामघाट के मोहल्ले खगोल और धर्मशास्त्र के जीवंत विश्वविद्यालय बन गए। काशी में ही रंगनाथ दैवज्ञ ने ‘सूर्य सिद्धांत’ पर प्रसिद्ध ‘गूढ़ार्थप्रकाशिका’ टीका लिखी, कमलाकर भट्ट ने ‘सिद्धांततत्त्वविवेक’ और नारायण भट्ट व कमलाकर भट्ट के परिवार ने ही पर्व-निर्णय के अमर ग्रंथ ‘निर्णयसिंधु’ की रचना की। आगे चलकर अठारहवीं सदी में महाराजा सवाई जयसिंह ने दशाश्वमेध घाट के पास मानमंदिर की छत पर वेधशाला बनवाई। उन्नीसवीं शताब्दी में काशी के संस्कृत महाविद्यालय (आज का संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय) में महामहोपाध्याय बापूदेव शास्त्री और महामहोपाध्याय पंडित सुधाकर द्विवेदी जैसे दिग्गज गणितज्ञ हुए, जिन्होंने प्राचीन सिद्धांत ग्रंथों का संपादन करने के साथ-साथ आधुनिक खगोलीय वेध (दृक्-पक्ष) से पंचांग की त्रुटियों को सुधारा और ‘गणकतरंगिणी’ जैसा ज्योतिष-इतिहास लिखा। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के श्री विश्वनाथ पंचांग, गणेश आपा पंचांग और हृषीकेश पंचांग जैसी संस्थाओं ने इसी विरासत को घर-घर तक पहुँचाया।

पंचांगकार व्रत और पर्व का निर्णय कैसे करते हैं?

सिद्धार्थ ने पूछा कि अक्सर लोगों में यह चर्चा होती है कि कोई त्योहार दो दिन क्यों पड़ रहा है, काशी के पंचांगकार इसका निर्णय कैसे करते हैं? त्रिलोकीनाथ जी ने समझाया कि चांद्र तिथि (जो सूर्य और चंद्रमा के बीच बारह-बारह अंश के अंतर से बनती है) चौबीस घंटे के सौर दिन के साथ ठीक-ठीक शुरू या खत्म नहीं होती—वह कभी दोपहर बारह बजे बदलती है, तो कभी रात के नौ बजे। काशी के पंचांगकार और धर्मशास्त्री ‘निर्णयसिंधु’ व ‘धर्मसिंधु’ के स्पष्ट नियमों का उपयोग करते हैं। नियम यह देखा जाता है कि उस विशेष पर्व का मुख्य कर्म किस काल का है—जैसे स्नान और दान के पर्व (मकर संक्रांति, मौनी अमावस्या, गंगा दशहरा) में ‘उदयातिथि’ और पुण्यकाल देखा जाता है; गणेश चतुर्थी में मध्याह्न-व्यापिनी चतुर्थी; करवा चौथ या प्रदोष व्रत में चंद्रोदय व प्रदोष-व्यापिनी तिथि; दीपावली में प्रदोष और निशीथ-व्यापिनी अमावस्या; तथा जन्माष्टमी और महाशिवरात्रि में मध्यरात्रि (निशीथ काल) की तिथि को प्रधानता दी जाती है। आज के दिन की उदयातिथि और तिथि-समाप्ति का सटीक समय आप दैनिक पंचांग पर भी आसानी से देख सकते हैं।

कुंभ महापर्व का खगोलीय गणित: गुरु, सूर्य और चंद्रमा का त्रिकोण

अब पंडित त्रिलोकीनाथ जी ने सिद्धार्थ के मूल प्रश्न—कुंभ की खगोलीय गणना—का रहस्य खोला। उन्होंने बताया कि कुंभ महापर्व किसी एक ग्रह से नहीं, बल्कि सौरमंडल के सबसे बड़े ग्रह बृहस्पति (गुरु), ऊर्जा के केंद्र सूर्य और मन व जल-तत्त्व के कारक चंद्रमा के विशेष राशि-संयोग से तय होता है। चूँकि बृहस्पति को बारह राशियों का एक चक्कर लगाने में लगभग बारह वर्ष (सटीक रूप से 11.86 सौर वर्ष) लगते हैं, इसलिए जब बृहस्पति आकाश की किसी निर्धारित राशि में प्रवेश करता है और उसी समय सूर्य अपनी वार्षिक गति में निर्धारित राशि में आता है, तब भारत की चार पवित्र नदियों के तट पर कुंभ का योग बनता है। प्रयागराज के त्रिवेणी संगम का नियम सबसे अनूठा है—जब बृहस्पति वृषभ राशि में स्थित हों (या मकर के सूर्य के साथ कुंभ/मेष के विशेष अर्धकुंभ व कुंभ समीकरण में हों) और सूर्य तथा चंद्रमा दोनों मकर राशि में प्रवेश करें, तो माघ मास में प्रयागराज का महाकुंभ योग बनता है। विशेष रूप से माघ कृष्ण अमावस्या (मौनी अमावस्या) के दिन सूर्य और चंद्रमा दोनों मकर राशि में एक ही अंश पर होते हैं और वृषभ राशि में बैठे बृहस्पति की उन पर ठीक नवम (पंचम-नवम त्रिकोण) दृष्टि पड़ती है! पृथ्वी के जल-तत्त्व और आकाश के गुरु-सूर्य-चंद्र के इस त्रिकोण-संबंध को ही कुंभ का अमृत-योग कहा गया है।

चारों कुंभ स्थलों (प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन, नासिक) का खगोलीय सूत्र

कुंभ महापर्व का तीर्थ-स्थलपवित्र नदी का तटबृहस्पति (गुरु) की राशि-स्थितिसूर्य (और चंद्रमा) की राशि-स्थिति व मास
प्रयागराज (तीर्थराज प्रयाग)गंगा, यमुना और अंतःसलिला सरस्वती का त्रिवेणी संगमवृषभ राशि में बृहस्पति (तथा मेष के गुरु और मकर के सूर्य-चंद्र के विशेष योग)मकर राशि में सूर्य और चंद्रमा (माघ मास, विशेषकर मकर संक्रांति, पौष पूर्णिमा, मौनी अमावस्या व वसंत पंचमी)
हरिद्वार (गंगाद्वार)हिमालय से मैदान में उतरती गंगा का तटकुंभ राशि में बृहस्पतिमेष राशि में सूर्य का प्रवेश (चैत्र-वैशाख मास / मेष संक्रांति)
उज्जयिनी (उज्जैन — सिंहस्थ कुंभ)क्षिप्रा नदी का पावन तटसिंह राशि में बृहस्पति (इसीलिए इसे ‘सिंहस्थ’ कहा जाता है)मेष राशि में सूर्य और तुला राशि में चंद्रमा (वैशाख मास की पूर्णिमा तक)
नासिक — त्र्यंबकेश्वर (सिंहस्थ)गोदावरी नदी का उद्गम और तटसिंह राशि में बृहस्पतिसिंह राशि में ही सूर्य (और कर्क/सिंह का संयोग, भाद्रपद मास)

क्या कुंभ हमेशा 12 साल में ही आता है, या 11वें साल में भी?

सिद्धार्थ ने एक सच्चे गणितज्ञ की तरह तुरंत पूछा, ‘बड़े पापा, बृहस्पति का परिक्रमा काल तो 12 साल नहीं, बल्कि लगभग 11.86 साल (यानी 11 साल और लगभग 315 दिन) है। तो हर साल वह लगभग 50 दिन का अंतर जमा करता जाएगा!’ पंडित त्रिलोकीनाथ जी ने प्रसन्न होकर उसकी पीठ थपथपाई और कहा, ‘बिल्कुल सही पकड़ा सिद्धार्थ! आम लोग भले ही कहें कि कुंभ हर बारह साल बाद आता है, पर पंचांग का खगोलीय गणित जानता है कि बृहस्पति बारह सौर वर्षों से लगभग पचास दिन पहले ही बारह राशियों का चक्कर पूरा कर लेता है। इसका परिणाम यह होता है कि छह या सात कुंभ-चक्रों (लगभग 83 से 85 वर्षों) के बाद बृहस्पति एक पूरी राशि आगे बढ़ जाता है, और उस बार कुंभ बारह वर्ष के बजाय ग्यारहवें वर्ष में ही पड़ जाता है—जैसा हरिद्वार में 2010 के बाद ग्यारह वर्ष के अंतराल पर 2021 में हुआ जब बृहस्पति कुंभ राशि में पहुँचे!’ बृहस्पति और सूर्य का यह वर्तमान गोचर किसी भी व्यक्ति की जन्म-कुंडली पर भी गहरा प्रभाव डालता है, जिसे आप गोचर फल और मुफ़्त कुंडली टूल के माध्यम से अपनी राशि के सापेक्ष देख सकते हैं।

काशी पंचांग और कुंभ-गणना की परंपरा से जुड़े चार मुख्य सूत्र

  • भारत के सभी बड़े पर्व—चाहे प्रयागराज का माघ व कुंभ मेला हो या उज्जैन का सिंहस्थ—आकाश में बृहस्पति, सूर्य और चंद्रमा के वास्तविक निरयण गोचर (प्रत्यक्ष खगोल) पर आधारित हैं।
  • प्रयागराज में हर वर्ष मकर संक्रांति से माघ पूर्णिमा तक चलने वाला ‘माघ मेला’ और ‘कल्पवास’ वास्तव में सूर्य के उत्तरायण प्रवेश और संयमित, सात्त्विक जीवनशैली के अभ्यास का पर्व है।
  • पंचांग में तिथियों का क्षय (जब कोई तिथि दो सूर्योदयों के बीच ही शुरू होकर समाप्त हो जाए) या वृद्धि (जब एक तिथि दो सूर्योदयों को स्पर्श करे) चंद्रमा की अंडाकार कक्षा में घटती-बढ़ती गति का स्वाभाविक खगोलीय परिणाम है, कोई अशुभ संकेत नहीं।
  • काशी की विद्वत् परंपरा ने हमें सिखाया है कि जब पुरानी सारणियों और आकाश के प्रत्यक्ष वेध में अंतर दिखे, तो रूढ़ि के बजाय शुद्ध खगोलीय गणित (दृक्-पक्ष) को अपनाना ही शास्त्र-सम्मत है।
जब आकाश में बृहस्पति वृषभ या कुंभ में आते हैं और सूर्य मकर या मेष की दहलीज़ छूता है, तो काशी के पंचांग का एक छोटा-सा श्लोक करोड़ों कदमों को संगम की रेत की ओर मोड़ देता है।

शास्त्रीय गणना की विरासत और आज का डिजिटल युग

संगम की ओर से आती हुई सुबह की धूप अब दारागंज के बरामदे तक पहुँच चुकी थी। सिद्धार्थ ने अपने हाथ में पकड़े पंचांग को बड़े सम्मान से देखा—कागज़ के उन पतले पन्नों में केप्लर के ग्रहीय गति के नियमों जैसा ही सूक्ष्म गणित और सदियों की सांस्कृतिक स्मृति एक साथ दर्ज थी। पंडित त्रिलोकीनाथ जी ने कहा कि जब तक हम अपने पर्वों और कुंडली-गणित के पीछे छिपे इस खगोलीय विज्ञान को समझते रहेंगे, तब तक हमारी परंपरा अंधविश्वास से मुक्त और जीवंत रहेगी। आज के समय में Astro Ratan काशी और उज्जयिनी की इसी शुद्ध दृक्-पक्षीय खगोलीय परंपरा—मानक लाहिड़ी (चित्रापक्ष) अयनांश, निरयण राशिचक्र और स्विस एफ़ेमेरिस—का उपयोग करके आपकी जन्म-कुंडली, विंशोत्तरी दशा और बृहस्पति-शनि के गोचर का शांत, सटीक व व्यावहारिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। भारतीय ज्योतिष के इतिहास और प्राचीन ग्रंथों की इस यात्रा को आगे पढ़ने के लिए हिंदी ज्योतिष से जुड़े रहें।

Key takeaways

  • काशी ने सोलहवीं-सत्रहवीं शताब्दी के दैवज्ञ परिवारों (रंगनाथ, मुनीश्वर, कमलाकर भट्ट) से लेकर उन्नीसवीं सदी के महामहोपाध्याय बापूदेव शास्त्री और सुधाकर द्विवेदी तक भारतीय खगोल-गणित को अखंड रूप से जीवित रखा।
  • काशी के पंचांगकार केवल तिथियाँ नहीं छापते, बल्कि ‘धर्मसिंधु’ और ‘निर्णयसिंधु’ के सूत्रों से सूर्योदय-व्यापिनी, प्रदोष-व्यापिनी या निशीथ-व्यापिनी तिथि को परखकर पूरे देश के व्रतों और पर्वों का निर्णय करते हैं।
  • प्रयागराज में हर वर्ष मकर संक्रांति से माघ पूर्णिमा तक ‘माघ मेला’ लगता है, किंतु जब बृहस्पति वृषभ राशि में हों और सूर्य व चंद्रमा मकर राशि में (माघ अमावस्या/मौनी अमावस्या) मिलें, तब प्रयागराज का पूर्ण ‘कुंभ महापर्व’ होता है।
  • इसी प्रकार बृहस्पति के कुंभ राशि में और सूर्य के मेष राशि में होने पर हरिद्वार में, बृहस्पति के सिंह राशि में और सूर्य के मेष में होने पर उज्जैन में, तथा बृहस्पति और सूर्य के सिंह राशि में होने पर नासिक (त्र्यंबकेश्वर) में कुंभ योग बनता है।
  • बृहस्पति का एक राशि-चक्र लगभग 11.86 वर्ष में पूरा होता है, इसलिए हर सातवें या आठवें कुंभ चक्र (लगभग 83–85 वर्ष) के बाद बृहस्पति एक राशि आगे निकल जाता है और कुंभ का अंतराल 12 के बजाय 11 वर्ष का भी हो सकता है।

कुंभ मेला किस साल और कहाँ लगेगा, यह आकाश के बृहस्पति और सूर्य कैसे तय करते हैं? काशी के पंचांग और प्रयागराज कुंभ का यह खगोलीय विज्ञान सबके साथ साझा करें।

काशी की शुद्ध दृक्-गणित परंपरा और लाहिड़ी अयनांश के आधार पर अपनी कुंडली में बृहस्पति, सूर्य और चंद्रमा की स्थिति व वर्तमान महादशा का अर्थ जानना चाहते हैं? Astro Ratan से पूछिए।

FAQ

प्रयागराज के त्रिवेणी संगम पर कुंभ महापर्व किस खगोलीय ग्रह-स्थिति (योग) में लगता है?

शास्त्रीय गणना के अनुसार जब बृहस्पति (गुरु) वृषभ राशि में स्थित होते हैं (या अर्धकुंभ/महाकुंभ के निर्धारित राशि-अक्ष पर होते हैं) और सूर्य व चंद्रमा मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तब माघ मास (जनवरी-फरवरी) में प्रयागराज के त्रिवेणी संगम पर कुंभ महापर्व का आयोजन होता है। इसमें मौनी अमावस्या के दिन मकर के सूर्य-चंद्र पर वृषभ के बृहस्पति की शुभ नवम दृष्टि पड़ती है।

उज्जैन और नासिक के कुंभ को ‘सिंहस्थ’ क्यों कहा जाता है और यह हरिद्वार कुंभ से कैसे अलग है?

उज्जैन (क्षिप्रा तट) और नासिक-त्र्यंबकेश्वर (गोदावरी तट) में कुंभ महापर्व तब लगता है जब बृहस्पति ‘सिंह’ राशि में स्थित होते हैं; सिंह राशि के गुरु के कारण ही इन्हें ‘सिंहस्थ’ कहा जाता है। इसके विपरीत हरिद्वार में कुंभ तब लगता है जब बृहस्पति ‘कुंभ’ राशि में हों और सूर्य मेष राशि में प्रवेश करे।

कुंभ मेला कभी-कभी 12 वर्ष के बजाय 11वें वर्ष में ही क्यों पड़ जाता है?

बृहस्पति को सूर्य की एक परिक्रमा (बारह राशियों का भ्रमण) पूरी करने में पूरे 12 सौर वर्ष नहीं, बल्कि लगभग 11.86 वर्ष (लगभग 11 वर्ष 10 माह) लगते हैं। प्रति चक्र लगभग 50 दिनों के इस अंतर के जुड़ने से हर 7वें या 8वें चक्र (लगभग 83–85 वर्षों) के बाद बृहस्पति एक राशि आगे निकल जाता है और कुंभ 11वें वर्ष में पड़ता है।

काशी की पंचांग और खगोल-गणित परंपरा के प्रमुख ऐतिहासिक विद्वान कौन रहे हैं?

सोलहवीं-सत्रहवीं शताब्दी में रंगनाथ दैवज्ञ, मुनीश्वर और कमलाकर भट्ट (‘सिद्धांततत्त्वविवेक’ व ‘निर्णयसिंधु’ की परंपरा) से लेकर उन्नीसवीं शताब्दी के महामहोपाध्याय बापूदेव शास्त्री और महामहोपाध्याय सुधाकर द्विवेदी तक काशी के विद्वानों ने भारतीय पंचांग, दृक्-गणित और पर्व-निर्णय को सर्वोच्च वैज्ञानिक स्तर प्रदान किया।