हिंदी / सहज हिंग्लिश
भारतीय पर्व, व्रत-त्योहार, पंचांग और ऋतु-चक्रहिंदी / सहज हिंग्लिश

सोमवती और शनिश्चरी अमावस्या: सोमवार या शनिवार को पड़ने वाली अमावस्या को दान, स्नान और आत्म-शांति के लिए क्यों विशेष माना गया है?

सूर्य-चंद्र की अमावस्या युति का सोमवार और शनिवार के साथ खगोलीय संयोग, पीपल परिक्रमा व पितृ-स्मरण का दर्शन और अंधविश्वासी भय से मुक्त सात्विक सेवा की रीति।

2026-10-19 9 min · 2,090 words

Direct answer

जब कृष्ण पक्ष की पंद्रहवीं तिथि यानी अमावस्या सोमवार को पड़ती है तो उसे सोमवती अमावस्या और शनिवार को पड़ती है तो शनिश्चरी अमावस्या कहा जाता है। खगोलीय रूप से अमावस्या को सूर्य और चंद्रमा एक ही राशि व अंश पर होते हैं। सोमवार चंद्रमा (मन) का वार है और शनिवार शनि (कर्म, अनुशासन व श्रमजीवियों) का वार है; इसलिए इन दोनों संयोगों को तीर्थ-स्नान, पितृ-तर्पण, पीपल वृक्ष के संरक्षण, मौन ध्यान और ज़रूरतमंदों को अन्न-वस्त्र दान करने के लिए अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है।

हरिद्वार के कनखल की सुबह और कैलाशनाथ जी की रसोई का सीधा नियम

हरिद्वार के कनखल क्षेत्र में रहने वाले बासठ वर्षीय सेवानिवृत्त शिक्षक कैलाशनाथ पंत के घर में शनिश्चरी अमावस्या की सुबह एक शांत व्यस्तता थी। उनकी पत्नी सुमित्रा जी रसोई में ताज़ी पूड़ियाँ, कद्दू की सब्ज़ी और सूजी का हलवा बना रही थीं, जिन्हें स्टील के साफ डिब्बों में रखा जा रहा था। तभी उनके पड़ोसी का युवा बेटा निखिल हाथ में अपने मोबाइल फोन की स्क्रीन दिखाता हुआ आया और घबराए स्वर में बोला कि चाचाजी, आज शनिश्चरी अमावस्या है और इस वीडियो में बताया जा रहा है कि आज मेरी राशि पर बहुत भारी संकट है, इसलिए चौराहे पर नींबू-मिर्च फेंकने और महँगा अनुष्ठान कराने से ही बचाव होगा। कैलाशनाथ जी ने स्नेह से निखिल के कंधे पर हाथ रखा और भोजन के डिब्बों तथा काले कंबलों के थैले की ओर इशारा करते हुए कहा कि बेटा, अमावस्या की रात केवल आकाश में चाँद नहीं दिखता, इसका यह मतलब थोड़े ही है कि हम अपनी बुद्धि का उजाला भी बुझा दें? चलो मेरे साथ ऋषिकुल के पास रिक्शा चलाने वाले और घाट के बाहर बैठने वाले वृद्धजनों को यह गर्म भोजन करा आते हैं—शनि और अमावस्या की इससे बड़ी कोई पूजा नहीं होती।

अमावस्या का खगोलीय अर्थ: जब सूर्य और चंद्रमा एक साथ बैठते हैं

कैलाशनाथ जी की सहज बात को समझने के लिए सबसे पहले पंचांग के गणित को जानना ज़रूरी है। वैदिक पंचांग में तिथि की गणना सूर्य और चंद्रमा के कोणीय अंतर (अंशों के अंतर) से होती है। जब चंद्रमा सूर्य से पीछे रहते हुए घूमकर सूर्य के बिल्कुल समीप आ जाता है—अर्थात् सूर्य और चंद्रमा के रेखांश का अंतर शून्य अंश (या 348 अंश से 360 अंश के मध्य) रह जाता है—तब कृष्ण पक्ष की पंद्रहवीं तिथि 'अमावस्या' होती है। संस्कृत में 'अमा' का अर्थ है 'एक साथ' और 'वस' का अर्थ है 'निवास करना'। जिस तिथि में सूर्य और चंद्रमा एक ही राशि व नक्षत्र-चरण में साथ निवास करते हैं, वही अमावस्या है। ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को आत्मा व प्राण का कारक और चंद्रमा को मन व भावनाओं का कारक माना गया है। अमावस्या को चंद्रमा की प्रकाशित कला पृथ्वी की ओर न होकर सूर्य की ओर होती है, इसलिए बाहरी रूप से चंद्रमा अदृश्य या क्षीण रहता है, किंतु आध्यात्मिक दृष्टि से यह मन के अंतर्मुखी होने और आत्मा (सूर्य) के पास बैठकर शांत होने का समय है। आप अपने शहर में अमावस्या के आरंभ और समाप्ति का सटीक समय दैनिक पंचांग में देख सकते हैं।

सोमवती अमावस्या: चंद्रमा के वार पर मन के शोधन और पीपल पूजन का पर्व

जब यह अमावस्या तिथि सोमवार (इंदुवार या सोमवार) के दिन पड़ती है, तो इसे 'सोमवती अमावस्या' कहा जाता है। महाभारत में भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को सोमवती अमावस्या की महिमा बताते हुए कहा था कि इस पावन संयोग की प्रतीक्षा में पांडवों ने भी लंबे समय तक तप किया था। ज्योतिषीय दृष्टि से सोमवार का स्वामी स्वयं चंद्रमा है। जिस दिन चंद्रमा का अपना वार हो और उसी दिन अमावस्या की सूर्य-चंद्र युति हो रही हो, वह दिन मन की चंचलता, पुरानी चिंता और भावनात्मक बोझ को शांत करने के लिए विशेष हो जाता है। भारतीय परंपरा में सोमवती अमावस्या पर पवित्र नदियों में स्नान करने, भगवान शिव (जो चंद्रमा को अपने मस्तक पर धारण कर सोमनाथ कहलाते हैं) का जलाभिषेक करने और पीपल (अश्वत्थ) के वृक्ष की एक सौ आठ परिक्रमा कर कच्चा सूत लपेटने का विधान है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है—'अश्वत्थः सर्ववृक्षाणाम्' (वृक्षों में मैं पीपल हूँ)। पर्यावरण की दृष्टि से भी पीपल सर्वाधिक प्राणवायु देने वाला और दीर्घजीवी वृक्ष है, जिसकी छांव में बैठना और प्रदक्षिणा करना स्नायु-तंत्र को अद्भुत शांति देता है।

शनिश्चरी अमावस्या: कर्म के देवता शनि और सेवा-धर्म का संगम

इसी प्रकार जब अमावस्या तिथि शनिवार के दिन आती है, तो वह 'शनिश्चरी अमावस्या' कहलाती है। ज्योतिष में शनि को कालपुरुष का दुख, श्रम, संयम, न्याय और सेवा का कारक माना गया है, तथा पौराणिक कथाओं में शनिदेव को सूर्यदेव और छाया का पुत्र कहा गया है। अमावस्या के दिन सूर्य और चंद्रमा एक साथ होते हैं और जब उस दिन शनिवार का संयोग जुड़ता है, तो सूर्य (पिता) और शनि (पुत्र) के तत्वों का आमना-सामना होता है। दुर्भाग्य से आजकल सोशल मीडिया और बाज़ारू प्रचार ने शनिश्चरी अमावस्या को किसी डरावने अभिशाप की तरह प्रस्तुत कर दिया है। वास्तव में शास्त्रों में शनिवार की अमावस्या को श्रमजीवियों, कुष्ठरोगियों, दिव्यांगजनों, सफाईकर्मियों और वृद्धजनों की सेवा का सबसे बड़ा दिन माना गया है। तिल, सरसों का तेल, काली उड़द, जूते-चप्पल, छाता या कंबल का दान किसी ग्रह को रिश्वत देने के लिए नहीं है; बल्कि ये वे वस्तुएँ हैं जो कड़ी धूप या कड़ाके की ठंड में मेहनत करने वाले किसी साधनहीन व्यक्ति के दैनिक जीवन की सबसे बड़ी आवश्यकता होती हैं।

सोमवती और शनिश्चरी अमावस्या की तुलनात्मक पंचांगीय व व्यावहारिक समझ

विशेषता / आधारसोमवती अमावस्याशनिश्चरी अमावस्या
पंचांग संयोगसोमवार (चंद्र वार) + अमावस्या तिथिशनिवार (शनि वार) + अमावस्या तिथि
प्रमुख ज्योतिषीय तत्वचंद्रमा (मन, जल तत्व, भावनात्मक संतुलन) और शिव-उपासनाशनि (कर्म, अनुशासन, धैर्य, श्रम) और न्यायपूर्ण सेवा
पारंपरिक लोकाचारतीर्थ-स्नान, पीपल वृक्ष पूजन व 108 परिक्रमा, मौन व्रतपीपल के नीचे सरसों के तेल का दीपक, हनुमान व शनि स्तोत्र पाठ
सात्विक दान का स्वरूपचावल, दूध, खीर, श्वेत वस्त्र, जल-पात्र व शिक्षा सामग्री का दानअन्न (उड़द-खिचड़ी), तेल, कंबल, पादुका, छाता व श्रमजीवियों की सहायता
मनोवैज्ञानिक लाभअति-विचार (ओवरथिंकिंग), मानसिक बेचैनी और पारिवारिक तनाव में कमीअज्ञात भय से मुक्ति, कार्य-अनुशासन और सामाजिक संवेदनशीलता का विकास

पितृ-स्मरण और अमावस्या: पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता की शांत परंपरा

प्रत्येक मास की अमावस्या के स्वामी 'पितर' (हमारे दिवंगत पूर्वज) माने गए हैं, और जब सोमवती या शनिश्चरी अमावस्या का योग बनता है, तो पितृ-तर्पण का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। अक्सर 'पितृ दोष' शब्द सुनकर भी लोग डर जाते हैं, जबकि भारतीय दर्शन में पितृ-स्मरण का अर्थ अत्यंत सात्विक और मानवीय है। आज हम जिस शरीर, परिवार, भाषा, संस्कार और घर में सांस ले रहे हैं, वह हमारे माता-पिता, दादा-दादी और अनगिनत पूर्वजों के परिश्रम व त्याग की देन है। महीने में एक दिन—अमावस्या के मध्याह्न काल में—दक्षिण दिशा की ओर मुख करके काले तिल और जल से अपने पूर्वजों का स्मरण करना, उनके नाम से किसी भूखे को भोजन कराना या किसी प्यासे के लिए जल की व्यवस्था करना, अपनी जड़ों के प्रति कृतज्ञता (ग्रैटिट्यूड) व्यक्त करने की पद्धति है। यदि आप जानना चाहते हैं कि आपकी जन्म-कुंडली में चंद्रमा, सूर्य और शनि की स्थिति कैसी है या साढ़ेसाती का वास्तविक चरण क्या है, तो आप मुफ़्त कुंडली टूल और साढ़ेसाती रिपोर्ट का उपयोग कर सकते हैं।

उदयातिथि और अपराह्न व्यापिनी अमावस्या का पंचांगीय भेद

कई बार पंचांग देखते समय गृहस्थों के सामने यह उलझन आती है कि अमावस्या एक दिन दोपहर में शुरू होकर अगले दिन सुबह समाप्त हो रही है, तो सोमवती या शनिश्चरी अमावस्या किस दिन मानी जाए? धर्मसिंधु और निर्णयसिंधु का नियम यहाँ बहुत स्पष्ट है। पितरों के निमित्त किए जाने वाले श्राद्ध और तर्पण कर्म के लिए 'अपराह्न व्यापिनी' अमावस्या (जिस दिन दोपहर के बाद के हिस्से में अमावस्या तिथि रहे) ली जाती है। वहीं, तीर्थ-स्नान, पीपल प्रदक्षिणा और प्रातःकालीन दान-पुण्य के लिए 'उदयातिथि' (जिस दिन सूर्योदय के समय अमावस्या हो) को प्राथमिकता दी जाती है। यदि सोमवार या शनिवार को सूर्योदय के समय अमावस्या कुछ घटी भी विद्यमान हो, तो स्नान-दान के लिए वही सोमवती या शनिश्चरी अमावस्या मान्य होती है।

अमावस्या पर क्या करें और किन अंधविश्वासों से पूरी तरह बचें

  • चौराहों पर नींबू, मिर्च, सिंदूर या अनाज फेंकने जैसे अंधविश्वासी टोटकों से दूर रहें; अन्न का अपमान और सड़क पर गंदगी फैलाना किसी भी शास्त्र में पुण्य नहीं कहा गया है।
  • इस दिन को अशुभ या डरावना मानने के बजाय अपने मन को शांत करने के लिए चुनें; दिन में कुछ समय मोबाइल व शोर से दूर रहकर मौन या ध्यान का अभ्यास करें।
  • दान सदैव पात्र और ज़रूरतमंद व्यक्ति को आदरपूर्वक दें—जैसे किसी निर्धन विद्यार्थी को किताबें, किसी बीमार को दवा या किसी श्रमिक को सम्मानजनक भोजन।
  • पीपल या बरगद के वृक्ष की पूजा करते समय उसके चारों ओर प्लास्टिक की थैलियाँ या कचरा न छोड़ें, बल्कि वर्ष में कम से कम एक छायादार वृक्ष लगाकर उसकी रक्षा करें।
अमावस्या की रात आकाश में चंद्रमा के छिप जाने का शोक नहीं है; वह अपने भीतर के अहंकार को शांत कर पूर्वजों की स्मृति और असहायों की सेवा से मन का दीपक जलाने की तिथि है।

निखिल का शांत मन और Astro Ratan के साथ शुद्ध पंचांग की समझ

उस सुबह निखिल ने कैलाशनाथ पंत जी के साथ जाकर घाट के बाहर बैठे वृद्धजनों और रिक्शा चालकों को गर्म भोजन के डिब्बे और कंबल बाँटे। जब एक बुजुर्ग ने मुस्कुराते हुए उसके सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया, तो निखिल के मन से उस डरावने वीडियो का सारा भय कपूर की तरह उड़ गया। उसने समझा कि ज्योतिष और पंचांग का उद्देश्य मनुष्य को डराकर कमज़ोर बनाना नहीं, बल्कि उसे सेवा और संयम से मज़बूत बनाना है। यदि आप भी आने वाली सोमवती या शनिश्चरी अमावस्या की सटीक तिथि, स्नान-दान का समय और अपनी कुंडली के अनुसार सात्विक मार्गदर्शन चाहते हैं, तो Astro Ratan आपकी सेवा में है। यह लाहिड़ी अयनांश और शुद्ध वैदिक गणनाओं के आधार पर बिना किसी भय या अंधविश्वास के आपके प्रश्नों का उत्तर देता है। अधिक जानकारी के लिए वैदिक उपाय और गोचर फल भी देखें।

Key takeaways

  • अमावस्या वह खगोलीय बिंदु है जब सूर्य (आत्मा) और चंद्रमा (मन) एक ही राशि और अंशों के निकट आते हैं, जिसे शास्त्रों में 'अमा' (एक साथ बसना) कहा गया है।
  • सोमवार को चंद्रमा के ही वार पर अमावस्या पड़ने से 'सोमवती अमावस्या' बनती है, जो मानसिक शांति, शिव-उपासना, अश्वत्थ (पीपल) प्रदक्षिणा और पारिवारिक सौहार्द के लिए विशेष है।
  • शनिवार को अमावस्या पड़ने से 'शनिश्चरी अमावस्या' बनती है, जो किसी तांत्रिक भय का दिन नहीं बल्कि श्रमजीवियों, असहायों की सेवा और आत्म-अनुशासन का पर्व है।
  • पंचांग के अनुसार स्नान-दान की अमावस्या के लिए उदयातिथि व प्रातःकाल का विचार होता है, जबकि पितृ-तर्पण व श्राद्ध कर्म के लिए मध्याह्न/अपराह्न व्यापिनी अमावस्या ली जाती है।
  • अमावस्या के नाम पर बेचे जाने वाले डरावने टोटकों से दूर रहकर अन्नदान, वृक्षारोपण और पंद्रह मिनट का शांत आत्मचिंतन करना ही सबसे प्रामाणिक वैदिक उपाय है।

सोमवती और शनिश्चरी अमावस्या के नाम पर फैलने वाले डर से बचें और जानिए इस तिथि का असली खगोलीय, ज्योतिषीय व सेवापरक महत्व।

जानना चाहते हैं कि अगली सोमवती या शनिश्चरी अमावस्या आपके शहर के पंचांग में कब है और आपकी कुंडली के चंद्रमा-शनि की स्थिति क्या कहती है? Astro Ratan से पूछिए।

FAQ

सोमवती अमावस्या और शनिश्चरी अमावस्या में मुख्य अंतर क्या है?

जब अमावस्या तिथि सोमवार को पड़ती है तो उसे सोमवती अमावस्या कहते हैं, जो चंद्रमा (मन की शांति), भगवान शिव की आराधना और पीपल परिक्रमा के लिए विशेष मानी जाती है। जब अमावस्या शनिवार को पड़ती है तो वह शनिश्चरी अमावस्या कहलाती है, जो शनिदेव (कर्म व न्याय), श्रमजीवियों की सहायता और संयम-साधना के लिए समर्पित है।

क्या अमावस्या के दिन जन्म होना या कोई कार्य करना अशुभ होता है?

यह एक आम भ्रांति है। अमावस्या को पंचांग में पितृ-कार्य, ध्यान, आध्यात्मिक साधना और दान के लिए अत्यंत पवित्र तिथि माना गया है। अमावस्या के दिन जन्मे व्यक्तियों में सूर्य और चंद्रमा एक साथ होने से अक्सर गहरी एकाग्रता और चिंतनशीलता पाई जाती है; किसी एक तिथि के कारण किसी व्यक्ति के जीवन को अशुभ मानना शास्त्रसम्मत नहीं है।

अमावस्या दो दिन पड़ रही हो तो स्नान-दान और तर्पण किस दिन करना चाहिए?

धर्मशास्त्र के अनुसार पितृ-तर्पण और श्राद्ध कर्म के लिए वह दिन चुना जाता है जिस दिन मध्याह्न के बाद (अपराह्न काल) में अमावस्या तिथि विद्यमान हो। वहीं पवित्र नदी में स्नान और प्रातःकालीन दान-पुण्य के लिए उदयातिथि (जिस दिन सूर्योदय के समय अमावस्या हो) को ग्रहण किया जाता है।

सोमवती या शनिश्चरी अमावस्या पर पीपल के वृक्ष की पूजा क्यों की जाती है?

गीता में भगवान ने पीपल (अश्वत्थ) को अपनी विभूति बताया है और पद्म पुराण के अनुसार पीपल के मूल, तने व शाखाओं में त्रिदेव तथा पितरों का वास माना गया है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी पीपल प्रचुर मात्रा में ऑक्सीजन देने वाला वृक्ष है, इसलिए इसकी परिक्रमा व जल-अर्पण प्रकृति-संरक्षण और मानसिक शांति दोनों से जुड़ा है।