बोलचाल के भोजपुरी
Extended-family boundariesबोलचाल के भोजपुरी

सास-ससुर के आदर भी, आपन हद भी: दुनो एके साथे हो सकेला

छोट माँग जब आदत बन के पति-पत्नी के बीच खीस जमावे लागे, तब पहिले दुनो एक होखीं, फेर नरमी से साफ बात।

2026-11-07 7 min · 1,605 words

Direct answer

In-laws से हद तय कइल बेअदबी ना ह, घर के शांति बचावे के इंतजाम ह। पहिले पति-पत्नी आपस में तय करीं कि का बदले के बा, फेर जेकर माई-बाप बा, उहे नरमी से बात करे। हर ‘ना’ के साथे एगो ‘हँ’ दीं, जइसे बिना बतवले मत आईं बाकिर एतवार के खाना साथे होई। गारी, मार भा दहेज के माँग पर सीधा मदद लीं।

एतवार, भोर साढ़े सात, दरवाजा में चाबी

धनबाद के हीरापुर में दू कमरा के एगो फ्लैट। किरण, 31 बरिस, एगो स्कूल में computer पढ़ावेली, आ छह दिन के हफ्ता के बाद बस एतवार के भोरे देर ले सुते के मिलेला। ओह दिन साढ़े सात बजे दरवाजा में चाबी घूमल। घंटी ना बाजल, काहे कि सासु जी के लगे घर के दोसर चाबी बा। ऊ झोला भर सब्जी लेले अइली, पीछे ससुर जी अखबार दबवले। “अरे, अबहीं ले सुतल बाड़ू? चलऽ, हम चाय चढ़ा देत बानी।” किरण नाइटी में रसोई ओर भगली। सासु जी के मन में कवनो खोट ना रहे; ऊ त बेटा के पसंद के करइला ले के आवेली। बाकिर ई छह महीना से हर एतवार के होत बा।

छोट माँग, बड़ खीस

ओह दिन साँझ के किरण विकास से कहली, “हफ्ता में एको दिन त हमार आपन होखे।” विकास, 34 बरिस, कोयला के एगो दफ्तर में accountant बाड़ें। बोललें, “माई ह, का कहीं? बुरा मान जइहें।” अब हर एतवार के किरण के मुँह भारी रहेला, विकास के लागेला कि मेहरारू उनकर माई से चिढ़ेली, आ सासु जी के लागेला कि पतोह में अपनापन नइखे। ससुराल के झगड़ा अक्सर सास-पतोह के ना होला; ऊ पति-पत्नी के बीच के चुप्पी होला, जवना के भार एगो चाबी पर टिक जाला।

हद के मतलब का ह, आ का ना

हद, जेकरा के आजकल boundary कहल जाला, के मतलब ई ना कि सास-ससुर के घर से दूर कर दीं भा उनकर मदद लेहल बंद कर दीं। एकर मतलब बा कि घर में के कब आई, पइसा आ बड़ फैसला पर पहिले के-के बात करी, आ कवना बात पर पति-पत्नी पहिले आपस में राय बनइहें, ई साफ रहे। आदर एगो भाव ह; हद एगो इंतजाम ह। जहाँ इंतजाम ना होला, उहाँ आदर धीरे-धीरे खीस में बदल जाला।

पहिला कदम: पति-पत्नी पहिले एक होखीं

  • एगो शांत बेरा चुनीं, झगड़ा के बीच ना। शुरुआत शिकायत से ना, जरूरत से करीं: “हमरा हफ्ता में एगो भोर चाहीं जवना में केहू बिना बतवले ना आवे।”
  • दुनो लोग अलगे-अलगे लिखीं कि कवन तीन बात सबसे जादा चुभत बा, फेर एगो बात चुनीं जवना से शुरुआत होई।
  • नियम बना लीं: जेकर माई-बाप, उहे बात करी। विकास अपना माई से कहिहें, किरण ना।
  • पहिलहीं तय कर लीं कि माई-बाबूजी दुख जतावें त केहू अकेले पीछे ना हटी; जवन तय भइल, ऊ दुनो के फैसला ह।

कुछ वाक्य जवन सचमुच काम आवेला

क्रम ई रहे: पहिले रिश्ता, फेर बदलाव, फेर एगो नया रास्ता। वाक्य अपना घर के बोली में ढाल लीं।

  • बेटा माई से: “माई, तू हर एतवार सब्जी ले के आवेलू, हमनी के नीक लागेला। बस आवे से पहिले एक बेर फोन कर दिहल करऽ, ताकि घर तइयार रहे।”
  • नया ‘हँ’ के साथे: “एतवार के भोर हमनी के एके आराम के बेरा बा। दुपहरिया के खाना सब साथे खाईं जा, तू लोग ओही बेरा आवऽ।”
  • पतोह से सीधे पूछल जाव त: “मम्मी जी, राउर बात हम समझत बानी। हम आ ई साथे बइठ के सोच लीं, फेर बताइब।”
  • पइसा भा फैसला पर: “बाबूजी, राउर सलाह हमनी खातिर जरूरी बा। पूछब जरूर, बाकिर आखिरी फैसला हमनी दुनो मिल के करब।”

पहिला बेर दुख होई, ओकरा के हार मत मानीं

पहिला बातचीत के बाद सासु जी के आँख भर सकेला, भा ऊ कह सकेली, “अब हम पराया हो गइनी?” केहू के दुख होखल ई ना बतावे कि रउआ गलत कइलीं; ई बस बतावेला कि बदलाव सचमुच भइल। दुख के मान दीं, बात ना छोड़ीं: “माई, तू पराया ना हउ। एही से त चाहत बानी कि तोहार आवल हमनी खातिर खुशी रहे, हड़बड़ी ना।” फेर दू-तीन हफ्ता नया इंतजाम निभाईं, आ केहू भुला जाव त बिना खीस के याद दिलाईं।

जब बात ना माने: हद के सीढ़ी

  • पहिला पायदान: नरम याद दिलावल, हर बेर एके वाक्य में, बिना लंबा भाषण के।
  • दोसरका: जेकर माई-बाप बा, ऊ अकेले में साफ कहे कि ई बात दुनो के तय कइल ह, केहू एक के जिद ना।
  • तीसरका: मामा भा बड़की दीदी जइसन कवनो भरोसा वाला बड़ के बीच में लीं, जेकर बात दुनो तरफ सुनल जाला।
  • चउथा: इंतजाम बदलीं, जइसे दोसर चाबी वापस लिहल भा मिले के दिन तय कइल। ई सजा ना, घर चलावे के ढंग ह; जरूरत पड़े त कवनो family counsellor के लगे दुनो साथे जाईं।

जहाँ आदर के नाम पर समझौता ना होखे

हर बात बातचीत से सुलझे वाला ना होला। गारी-गलौज, हाथ उठावल, दहेज भा पइसा के माँग के दबाव, केहू के फोन भा तनखाह पर कब्जा, भा मायका से मिले-बोले पर रोक: ई हद के सवाल ना, सुरक्षा के सवाल ह। अइसन में “घर के बात घरे में रहे” वाला सलाह मत मानीं। कवनो भरोसा वाला आदमी के बताईं, हर घटना के तारीख लिख के रखीं, आ खतरा लागे त तुरंत 112 पर फोन करीं। बड़ के आदर के मतलब चुपचाप सहल ना ह, ना मायका में, ना ससुराल में।

दोसरा तरफ से भी एक बेर देखीं

विकास के माई खातिर ई बदलाव आसान नइखे। अब बेटा के आपन घर बा, जवना में उनकर जगह नया ढंग से बने के बा। उनकर डर ई हो सकेला कि बेटा छूट जाई। एह से हद के साथे जुड़ाव के एगो पक्का रास्ता भी दीं: हफ्ता में एगो तय दिन के खाना, भा रोज साँझ के पाँच मिनट के फोन। जब माई के भरोसा रहेला कि उनकर जगह बनल बा, तब नया नियम कम चुभेला।

आदर के असली परीक्षा ई ना कि रउआ केतना सहलीं; ई बा कि दस बरिस बाद भी रउआ मन से उनका घरे जाए के चाहत बानी कि ना।

ग्रह पर दोष, आ सहमति के सवाल

कुछ घर में ससुराल के तनाव के दोष ग्रह पर डाल दिहल जाला: “पतोह के मंगल भारी बा” भा “सास के शनि चलत बा”। कवनो ग्रह ई तय ना करे कि एतवार के दरवाजा कइसे खुली। आपन कुंडली से रउआ ई जरूर समझ सकेलीं कि टकराव से काहे भागेलीं भा जल्दी काहे भड़केलीं। बाकिर सास-ससुर के मन उनकर चार्ट से पढ़ल ठीक नइखे, आ उनकर कुंडली तबे देखल जाव जब ऊ खुद राजी होखस। परिवार आ ज्योतिष में हर सदस्य के प्रोफाइल उनकर आपन चार्ट आ सहमति से बनेला। Astro Ratan एगो AI वैदिक ज्योतिषी ह, जवना से WhatsApp पर आपन सवाल पूछ सकेलीं; घर के फैसला रउआ दुनो के रही।

किरण आ विकास के घर में का भइल

विकास अपना माई-बाबूजी के अकेला बेटा बाड़ें, एह से ऊ लोग हद के साथे आगे के देखभाल पर भी बतियावल; ई सवाल अकेला संतान पर देखभाल के बोझ वाला लेख में विस्तार से बा। आखिर में तय भइल कि चाबी सासु जी के लगे रही, बाकिर आवे से पहिले फोन, आ एतवार के दुपहरिया के खाना साथे। पहिला दू हफ्ता सासु जी रूसल रहली। तीसरका हफ्ता शनिचर के साँझ उनकर फोन आइल: “काल्ह करइला ले आईं? कतना बजे ठीक रही?”

Key takeaways

  • In-laws वाला तनाव अक्सर सास-पतोह के ना, पति-पत्नी के बीच के चुप्पी होला; पहिले दुनो आपस में एक होखीं।
  • जेकर माई-बाप, उहे बात करे; पतोह भा दामाद के मुँह से हद के बात अक्सर लड़ाई बन जाला।
  • हर ‘ना’ के साथे एगो ‘हँ’ दीं, ताकि बदलाव छीनल ना, नया ढंग से जुड़ल लागे।
  • पहिला बेर दुख होई, ओकरा के असफलता मत मानीं; दू-तीन हफ्ता नया इंतजाम शांति से निभाईं।
  • गारी, मार-पीट, दहेज के माँग भा मायका से मिले पर रोक हद के ना, सुरक्षा के सवाल ह; खतरा होखे त 112।

जे दोस्त ससुराल के हर छोट माँग पर हँ कह के भीतर-भीतर घुटत बा, ओकरा खातिर बोले के तरीका, बिना बेअदबी के।

ससुराल के कवनो बात पर मन उलझल बा आ आपन स्वभाव आ चलत दशा के बारे में शांति से पूछे के बा, त WhatsApp पर आपन कुंडली के साथे सवाल लिखीं।

FAQ

पति अपना माई-बाप से एह बारे में बात करे से मना करस त का करीं?

अक्सर मना करे के पीछे डर होला कि माई दुखी होइहें भा झगड़ा बढ़ी। उनका से पूछीं कि ऊ कवना बात से डेरात बाड़ें, आ मिल के पहिला वाक्य लिख लीं जवन ऊ बोलिहें। कई बेर एगो छोट माँग, जइसे आवे से पहिले फोन, से शुरू कइला पर हिम्मत बनेला।

संयुक्त परिवार में रहत बानी, अलग घर संभव नइखे; तबो हद बन सकेला?

हँ, हद खाली दीवार से ना बनेला। अपना कमरा के दरवाजा पर खटखटा के आवे के आदत, हफ्ता में एगो साँझ जवना में पति-पत्नी बाहर घूमे जास, आ आपन कमाई के एगो हिस्सा पर आपन फैसला, ई सब साथे रहतो संभव बा। नियम कम रखीं, बाकिर जवन रखीं ऊ निभाईं।

सासु जी रिश्तेदार लोग से हमार शिकायत करत बाड़ी, हम जवाब दीं कि ना?

रिश्तेदार के सामने सफाई देवे में उलझला से बात अउरी फइलेला। जेकरा से राउर संबंध ठीक बा, ओकरा से बस एतना कहीं कि घर के बात घर में सुलझ रहल बा। शिकायत बढ़त जाव त पति से कहीं कि ऊ अपना माई से सीधे बात करस।

Boundary वाला बात शहर के नया फैशन ह का, हमनी के संस्कार में ई कहाँ बा?

पुरान घर में भी हद रहे, बस ओकरा नाम ना रहे: केकरा कोठरी में के जाई, भंडार के चाबी केकरा लगे रही, कवन फैसला बड़ करिहें। आज घर छोट बा आ दुनो कमात बा, एह से नियम नया ढंग से तय करे के पड़ेला। आदर आ इंतजाम हमेशा साथे चलत आइल बा।

हद तय कइला से सास-ससुर के सेवा में कमी त ना आई?

जब घर में खीस जमल रहेला तब सेवा भी बोझ लागेला आ बरताव में रूखापन आ जाला। साफ इंतजाम से मन हल्का रहेला, आ बीमारी भा जरूरत के बेरा मदद पहिले से जादा मन से होला। सेवा आ हद एक-दोसरा के दुश्मन ना हवें।