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भारतीय ज्योतिष का इतिहास, प्राचीन ग्रंथ, खगोल-परंपरा और तीर्थ-विज्ञानहिंदी / सहज हिंग्लिश

भास्कराचार्य द्वितीय और ‘सिद्धांत शिरोमणि’: अपनी पुत्री लीलावती के नाम पर रचे गए गणित ग्रंथ और ग्रह-गति के अद्भुत सूत्र

बारहवीं शताब्दी (1150 ईस्वी) में रचित ‘सिद्धांत शिरोमणि’ के चार भाग—लीलावती, बीजगणित, ग्रहगणिताध्याय और गोलाध्याय—कैसे काव्य, गुरुत्वाकर्षण और तात्कालिक ग्रह-गति (Calculus पूर्व-सूत्र) का अद्भुत संगम हैं?

2026-10-19 9 min · 2,099 words

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महान भारतीय गणितज्ञ और खगोलविद भास्कराचार्य द्वितीय (जन्म 1114 ईस्वी) ने 1150 ईस्वी में छत्तीस वर्ष की आयु में ‘सिद्धांत शिरोमणि’ की रचना की। इसके चार प्रसिद्ध खंड हैं: ‘लीलावती’ (अंकगणित व क्षेत्रमिति), ‘बीजगणित’, ‘ग्रहगणिताध्याय’ और ‘गोलाध्याय’। उन्होंने गोलाध्याय में पृथ्वी की ‘आक्षिप्त/आकृष्टिशक्ति’ (गुरुत्वाकर्षण) का स्पष्ट उल्लेख किया और ग्रहों की सूक्ष्म ‘तात्कालिक गति’ निकालने के लिए अवकलन (Differential Calculus) के प्रारंभिक सूत्रों का आविष्कार किया।

जयपुर की एक दोपहर: भँवरों के झुंड और कमल के फूल से निकला समीकरण

जयपुर के बापू नगर में रहने वाली चौंतीस वर्षीया गणित शिक्षिका मृणालिनी शर्मा रविवार की दोपहर अपनी बारह साल की बेटी अनन्या को भिन्न (Fractions) के सवाल समझा रही थीं। अनन्या ऊबकर पेंसिल घुमाने लगी, तो मृणालिनी ने किताब बंद कर दी और एक कहानी सुनाई: ‘मान लो एक सरोवर के पास भँवरों के एक झुंड का पाँचवाँ हिस्सा कदंब के फूल पर गया, एक-तिहाई हिस्सा शिलिंध्र के फूल पर गया, उन दोनों के अंतर का तीन गुना कुटज के फूलों पर उड़ गया, और केवल एक अकेला भँवरा केतकी और मालती की सुगंध के बीच हवा में भटक रहा है। तो हे प्रिय लीलावती, बताओ कुल कितने भँवरे थे?’ अनन्या की आँखें चमक उठीं; उसने तुरंत कागज़ पर समीकरण बनाया और उत्तर निकाला—पंद्रह भँवरे! तब मृणालिनी ने मुस्कुराते हुए बताया कि यह सवाल किसी आधुनिक पहेली की किताब का नहीं है, बल्कि आज से लगभग नौ सौ साल पहले सन् 1150 ईस्वी में महान खगोलविद और ज्योतिषाचार्य भास्कराचार्य द्वितीय ने अपनी बेटी ‘लीलावती’ के लिए लिखा था।

भास्कराचार्य द्वितीय और ‘सिद्धांत शिरोमणि’ के चार स्तंभ

भारतीय गणित और ज्योतिष के इतिहास में ‘भास्कर’ नाम के दो बड़े आचार्य हुए हैं। सातवीं शताब्दी में ‘भास्कर प्रथम’ हुए, जिन्होंने आर्यभटीय पर प्रसिद्ध भाष्य लिखा; और बारहवीं शताब्दी में ‘भास्कराचार्य द्वितीय’ (या केवल भास्कराचार्य) हुए, जिनका जन्म 1114 ईस्वी (शक संवत् 1036) में सह्याद्रि पर्वत श्रृंखला के निकट विज्जड़विड (वर्तमान महाराष्ट्र के जलगाँव/चालीसगाँव के पास पाटन क्षेत्र) में हुआ था। उनके पिता महेश्वर स्वयं एक प्रकांड दैवज्ञ थे, जिनसे भास्कराचार्य ने गणित और ज्योतिष की शिक्षा पाई। मात्र छत्तीस वर्ष की आयु में सन् 1150 ईस्वी में उन्होंने अपने युगप्रवर्तक ग्रंथ ‘सिद्धांत शिरोमणि’ की रचना की। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है—सभी खगोलीय सिद्धांतों के मुकुट-मणि के रूप में रचा गया यह ग्रंथ चार स्वतंत्र किंतु परस्पर जुड़े हुए भागों में बँटा है: पहला पाटीगणित या ‘लीलावती’, दूसरा ‘बीजगणित’, तीसरा ‘ग्रहगणिताध्याय’ और चौथा ‘गोलाध्याय’। इसके अतिरिक्त अड़सठ वर्ष की आयु (1183 ईस्वी) में उन्होंने पंचांग और खगोलीय गणनाओं की सरल व्यावहारिक पुस्तिका के रूप में ‘करणकुतूहल’ भी लिखा।

‘लीलावती’ की कथा: जब मुहूर्त की पीड़ा एक अमर गणित ग्रंथ में बदल गई

लोक-परंपरा में ‘लीलावती’ की रचना के पीछे पिता और पुत्री के स्नेह की एक बहुत मार्मिक कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि भास्कराचार्य ने अपनी पुत्री लीलावती के वैवाहिक सुख के लिए अत्यंत सूक्ष्म गणना करके एक विशिष्ट शुभ लग्न और मुहूर्त निकाला था। समय की सटीक माप के लिए वहाँ एक जल-घड़ी (घटिका यंत्र) रखी गई थी, जिसके नीचे के बारीक छिद्र से पानी रिसने पर तय पल का पता चलना था। बालसुलभ जिज्ञासा से जब लीलावती ने उस जल-घड़ी में झाँका, तो उसकी नथ या वस्त्र से एक छोटा-सा मोती गिरकर घड़ी के छिद्र में अटक गया। पानी का बहाव रुक गया, शुभ मुहूर्त कब का बीत गया और आगे चलकर लीलावती को वैधव्य का दुःख सहना पड़ा। अपनी उदास पुत्री का मन अवसाद से निकालने और उसके नाम को जब तक सूर्य-चंद्र रहें तब तक अमर कर देने के लिए भास्कराचार्य ने अंकगणित और क्षेत्रमिति का यह काव्यात्मक ग्रंथ रचा। चाहे इस लोक-कथा के ऐतिहासिक रूप पर विद्वानों के अलग-अलग मत हों, पर यह निर्विवाद सत्य है कि विश्व के गणित इतिहास में ‘लीलावती’ जैसा ललित, काव्यात्मक और संवादात्मक ग्रंथ दूसरा नहीं है। मुगल काल में फैज़ी ने इसका फ़ारसी में अनुवाद किया और कई शताब्दियों तक पूरे भारत में गणित की शिक्षा इसी ग्रंथ से दी जाती रही।

‘सिद्धांत शिरोमणि’ के चार खंड और उनकी प्रमुख वैज्ञानिक देन

सिद्धांत शिरोमणि का भागमुख्य विषय-क्षेत्रप्रमुख सूत्र और खगोलीय-गणितीय उपलब्धि
1. लीलावती (पाटीगणित)अंकगणित, क्षेत्रमिति व ज्यामितिभिन्न, श्रेढ़ी, त्रैराशिक नियम, गोले का पृष्ठीय क्षेत्रफल व आयतन, तथा काव्यात्मक पहेलियाँ
2. बीजगणितबीजगणितीय समीकरण व अनंतधनात्मक-ऋणात्मक संख्याएँ, शून्य से भाग देने पर ‘खहर’ (अनंत/Infinity) की अवधारणा और ‘चक्रवाल’ विधि
3. ग्रहगणिताध्यायस्पष्ट ग्रह-स्थिति व पंचांग गणितग्रहों की मध्यम व स्पष्ट गति, ‘तात्कालिक गति’ (अवकलन/Calculus पूर्व-सूत्र), सूर्य-चंद्र ग्रहण और उदयास्त
4. गोलाध्यायखगोलीय गोल, भूगोल व यंत्रपृथ्वी की ‘आकृष्टिशक्ति’ (गुरुत्वाकर्षण), ऋतु-वर्णन, खगोलीय वेध यंत्र (फलक यंत्र, नाड़ीवलय) और ज्योत्पत्ति

गोलाध्याय और पृथ्वी की ‘आकृष्टिशक्ति’ (गुरुत्वाकर्षण)

न्यूटन से लगभग पाँच सौ वर्ष पूर्व भास्कराचार्य ने ‘सिद्धांत शिरोमणि’ के चौथे भाग ‘गोलाध्याय’ के ‘भुवनकोश’ प्रकरण में पृथ्वी के गोल स्वरूप और उसके गुरुत्वाकर्षण बल पर अत्यंत स्पष्ट श्लोक लिखे। उस समय के कुछ सामान्य लोगों की शंका थी कि यदि पृथ्वी गोल है और अंतरिक्ष में बिना किसी आधार के टिकी है, तो पृथ्वी के निचले या पार्श्व भाग में रहने वाले लोग और वस्तुएँ अंतरिक्ष में गिर क्यों नहीं जाते? इसका उत्तर देते हुए भास्कराचार्य ने भुवनकोश के छठे श्लोक में लिखा: ‘आकृष्टिशक्तिश्च मही तया यत् खस्थं गुरु स्वाभिमुखं स्वशक्त्या। आकृष्यते तत्पततीव भाति समे समन्तात् क्व पतत्वियं खे॥’ अर्थात् पृथ्वी में आकर्षण की शक्ति (आकृष्टिशक्तिः) है; वह अपनी इस शक्ति से आकाश में स्थित भारी पदार्थों (गुरु) को अपनी ओर (स्वाभिमुखं) खींचती है, और जिस वस्तु को वह खींचती है, वह गिरती हुई प्रतीत होती है। जब चारों ओर आकाश समान है, तो पृथ्वी स्वयं कहाँ गिरेगी? इसके साथ ही उन्होंने यह भी समझाया कि पृथ्वी के विशाल गोले के सौवें हिस्से की परिधि पर खड़े मनुष्य को पृथ्वी सपाट क्यों दिखाई देती है।

‘खहर’ (अनंत) और ग्रहों की ‘तात्कालिक गति’ में छिपा कैलकुलस

बीजगणित और ग्रहगणित में भास्कराचार्य की दो खोजें आधुनिक उच्च गणित के बहुत करीब हैं। पहली है ‘खहर’—अर्थात् किसी संख्या को शून्य (ख) से भाग देने पर प्राप्त होने वाली राशि। भास्कराचार्य ने लिखा कि इस ‘खहर’ (अनंत या Infinity) की विशेषता यह है कि इसमें कोई बहुत बड़ी संख्या जोड़ दी जाए या इसमें से कोई संख्या घटा ली जाए, तब भी इसमें कोई विकार या परिवर्तन नहीं होता (जैसे प्रलय और सृष्टि के समय अनंत अच्युत परमात्मा में जीवों के लीन होने या निकलने से कोई अंतर नहीं पड़ता)। दूसरी और सबसे चमत्कारी खोज ‘ग्रहगणिताध्याय’ के स्पष्टाधिकार में है। पंचांग और कुंडली के लिए चंद्रमा की सटीक स्थिति निकालना सबसे कठिन था, क्योंकि चंद्रमा की गति हर घंटे बदलती है। भास्कराचार्य ने दिन को बहुत सूक्ष्म समय-अंतरालों (‘तत्काल’) में बाँटा और ग्रह की ‘तात्कालिक गति’ (Instantaneous velocity) निकालने के लिए ज्या (Sine) के सूक्ष्म अंतर का सूत्र दिया कि d(sin y) का मान cos y (कोटिज्या) के समानुपाती होता है, और जहाँ ग्रह अपनी उच्चतम या न्यूनतम गति पर पहुँचता है, वहाँ उसका तात्कालिक अंतर शून्य हो जाता है (जो आधुनिक गणित में Rolle's Theorem का मूल आधार है)। आज जब हम दैनिक पंचांग में तिथियों के समाप्त होने का मिनट और सेकंड देखते हैं, तो वह इसी तात्कालिक गति के सिद्धांत से निकलता है।

द्विघात अनिर्धार्य समीकरणों के लिए ‘चक्रवाल विधि’ और वेध-यंत्र

बीजगणित में जिसे यूरोप में सत्रहवीं सदी में ‘पेल का समीकरण’ (Pell's Equation: Nx^2 + 1 = y^2) कहा गया, उसे हल करने के लिए ब्रह्मगुप्त के कार्य को आगे बढ़ाते हुए भास्कराचार्य ने ‘चक्रवाल विधि’ (Cyclic Method) दी। उन्होंने N = 61 जैसे कठिनतम समीकरण का पूर्णांक हल निकालकर दिखाया, जिसे यूरोप में पाँच सौ साल बाद फ़र्मा और यूलर के समय फिर से खोजा गया। इतना ही नहीं, भास्कराचार्य केवल कागज़ पर गणित नहीं करते थे; गोलाध्याय के ‘यंत्राध्याय’ में उन्होंने आकाश में ग्रहों के वास्तविक अंश नापने के लिए नाड़ीवलय, यष्टियंत्र, घटियंत्र, चक्रयंत्र, चापयंत्र, तुर्ययंत्र और अपने स्वयं के आविष्कृत ‘फलक यंत्र’ का विस्तृत निर्माण-विधान लिखा। अंत में उन्होंने ‘धीवृद्धिद’ यंत्र की बात करते हुए चुटकी ली कि किसी भी खगोलविद का सबसे बड़ा यंत्र उसकी अपनी प्रखर बुद्धि (धी) ही है। अपनी जन्म-कुंडली में ग्रहों के स्पष्ट अंशों को आप मुफ़्त कुंडली टूल पर देख सकते हैं।

भास्कराचार्य के जीवन और ग्रंथों से मिलने वाली चार प्रमुख प्रेरणाएँ

  • गणित और खगोल रूखे विषय नहीं हैं; ‘लीलावती’ सिद्ध करती है कि कठिन से कठिन सूत्र को भी प्रकृति के सौंदर्य और कविता के माध्यम से आनंददायी बनाया जा सकता है।
  • पृथ्वी की आकर्षण शक्ति और गोलाकार भूगोल की समझ भारतीय सिद्धांत-ग्रंथों में सदियों से स्पष्ट रूप में विद्यमान थी।
  • ग्रहों की गति एक-सी नहीं रहती; उनकी ‘तात्कालिक गति’ (वक्री, मार्गी, अतिचारी, मंद) को समझे बिना सटीक पंचांग या गोचर फल नहीं निकाला जा सकता।
  • व्यक्तिगत जीवन की किसी त्रासदी या पीड़ा को भी ज्ञान-सृजन में बदला जा सकता है, जैसा भास्कराचार्य ने अपनी पुत्री के नाम को गणित के इतिहास में अमर करके दिखाया।
आकृष्टिशक्तिश्च मही तया यत् खस्थं गुरु स्वाभिमुखं स्वशक्त्या। आकृष्यते तत्पततीव भाति समे समन्तात् क्व पतत्वियं खे॥ — भास्कराचार्य द्वितीय (सिद्धांत शिरोमणि, गोलाध्याय, भुवनकोश, श्लोक 6)

लीलावती के पन्नों से आधुनिक सटीक ज्योतिष तक

जयपुर के उस घर में अनन्या ने उस शाम अपनी माँ से लीलावती की और भी पहेलियाँ सुनीं—कभी हंसों के जोड़े की, कभी हवा के झोंके से टूटे कमल के डंठल (पाइथागोरस प्रमेय) की। भास्कराचार्य द्वितीय ने बारहवीं शताब्दी में जिस खगोलीय सूक्ष्मता और तात्कालिक ग्रह-गति को साधा था, वही आज के कंप्यूटर-आधारित पंचांग और कुंडली सॉफ्टवेयर का वैचारिक पूर्वज है। आज Astro Ratan उसी शुद्ध गणितीय परंपरा का सम्मान करते हुए स्विस एफ़ेमेरिस और निरयन लाहिड़ी अयनांश के माध्यम से चंद्रमा और अन्य ग्रहों की तात्कालिक गति, स्पष्ट अंश और नक्षत्र-चरणों की सटीक गणना करता है। यदि आप भी अपनी जन्म-कुंडली, दशा और ग्रहों के गोचर को बिना किसी भय के, तार्किक और प्रामाणिक रूप में समझना चाहते हैं, तो गोचर फल और हिंदी ज्योतिष के माध्यम से इस वैज्ञानिक विरासत को अपने जीवन के निर्णयों से जोड़ सकते हैं।

Key takeaways

  • भास्कराचार्य द्वितीय (1114–1185 ईस्वी) सह्याद्रि पर्वत क्षेत्र के विज्जड़विड (पाटन, महाराष्ट्र) से संबद्ध थे और आगे चलकर उज्जयिनी की वेधशाला परंपरा के सर्वोच्च आचार्य बने।
  • 1150 ईस्वी में रचित उनके महाग्रंथ ‘सिद्धांत शिरोमणि’ के चार स्तंभ हैं: लीलावती, बीजगणित, ग्रहगणिताध्याय और गोलाध्याय।
  • ‘लीलावती’ में उन्होंने अपनी पुत्री को ‘अये बाले लीलावति!’ कहकर संबोधित किया और भँवरों, हंसों, कमल के फूलों व मोतियों के हार के काव्यात्मक उदाहरणों से अंकगणित और ज्यामिति सिखाई।
  • ‘गोलाध्याय’ के भुवनकोश में उन्होंने स्पष्ट लिखा कि पृथ्वी में आकर्षण शक्ति (आकृष्टिशक्तिः) है, जिसके कारण वह भारी पदार्थों को अपनी ओर खींचती है और वे नीचे गिरते प्रतीत होते हैं।
  • ग्रहों और विशेषकर चंद्रमा की प्रतिक्षण बदलती गति को मापने के लिए उन्होंने ‘तात्कालिक गति’ (Instantaneous velocity) का सूत्र दिया, जिसमें आधुनिक अवकलन (Calculus: d(sin x) = cos x dx) की स्पष्ट झलक मिलती है।

न्यूटन से 500 साल पहले भास्कराचार्य ने ‘सिद्धांत शिरोमणि’ में पृथ्वी की आकर्षण शक्ति और अपनी बेटी ‘लीलावती’ के नाम पर गणित की सबसे सुंदर पुस्तक कैसे रची? पढ़िए यह लेख।

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FAQ

भास्कराचार्य द्वितीय के ‘सिद्धांत शिरोमणि’ के चार भाग कौन-से हैं और उनका क्रम क्या है?

सिद्धांत शिरोमणि के चार भाग हैं: 1. लीलावती (जिसमें अंकगणित, भिन्न, श्रेढ़ी और क्षेत्रमिति है), 2. बीजगणित (जिसमें शून्य, अनंत, करणी और चक्रवाल विधि है), 3. ग्रहगणिताध्याय (जिसमें ग्रहों की मध्यम व स्पष्ट गति, तात्कालिक गति और ग्रहण का गणित है), तथा 4. गोलाध्याय (जिसमें ब्रह्मांड का भूगोल, पृथ्वी की आकर्षण शक्ति, ऋतुएँ और वेध-यंत्रों का वर्णन है)।

भास्कराचार्य के ‘बीजगणित’ में शून्य से भाग देने पर प्राप्त ‘खहर’ (अनंत) को कैसे समझाया गया है?

भास्कराचार्य ने किसी संख्या के हर (Denominator) में शून्य (ख) होने पर उसे ‘खहर’ नाम दिया, जो आधुनिक गणित में असीमित या अनंत (Infinity) के समतुल्य है। उन्होंने इसके गुण को समझाते हुए लिखा कि इस राशि में कोई बड़ी से बड़ी संख्या जोड़ने या घटाने पर भी इसमें कोई परिवर्तन नहीं होता, ठीक वैसे ही जैसे सृष्टि और प्रलय में अनंत ईश्वर में जीवों के आने-जाने से कोई अंतर नहीं पड़ता।

पंचांग और कुंडली निर्माण में भास्कराचार्य की ‘तात्कालिक गति’ (Instantaneous Motion) क्यों महत्वपूर्ण है?

आकाश में ग्रह (विशेषकर चंद्रमा) हर समय एक समान वेग से नहीं चलते; अपनी कक्षा में वे कभी तेज़ और कभी धीमे चलते हैं। केवल 24 घंटे की औसत गति (मध्यम गति) लेने से तिथि और नक्षत्र के समय में अंतर आ जाता था। भास्कराचार्य ने अति-सूक्ष्म समय अंतरालों के लिए कोटिज्या (Cosine) आधारित ‘तात्कालिक गति’ का सूत्र दिया, जिससे किसी भी क्षण ग्रह के बिल्कुल सटीक स्पष्ट अंश निकाले जा सकें।

भास्कराचार्य प्रथम और भास्कराचार्य द्वितीय में क्या अंतर है?

भास्कर प्रथम सातवीं शताब्दी (लगभग 600–680 ईस्वी) के खगोलविद थे, जिन्होंने आर्यभट की परंपरा में ‘महाभास्करीय’, ‘लघुभास्करीय’ और आर्यभटीय का भाष्य लिखा तथा ज्या (Sine) का प्रसिद्ध सन्निकट सूत्र दिया। इसके विपरीत भास्कराचार्य द्वितीय बारहवीं शताब्दी (1114–1185 ईस्वी) में हुए, जिन्होंने ‘सिद्धांत शिरोमणि’ (लीलावती, बीजगणित आदि) और ‘करणकुतूहल’ की रचना की।

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