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भारतीय ज्योतिष का इतिहास, प्राचीन ग्रंथ, खगोल-परंपरा और तीर्थ-विज्ञानहिंदी / सहज हिंग्लिश

आचार्य ब्रह्मगुप्त (भीनमाल, राजस्थान): शून्य के गणितीय नियमों से लेकर ग्रहों की वेधशाला द्वारा गणना तक का योगदान

सन् 628 ईस्वी में भीनमाल (श्रीमाल) में रचित ‘ब्रह्मस्फुटसिद्धांत’ ने पहली बार शून्य (0), धनात्मक (‘धन’) और ऋणात्मक (‘ऋण’) संख्याओं के बीजगणितीय नियम दिए और वेध-आधारित पंचांग संशोधन की नींव रखी।

2026-10-19 9 min · 2,064 words

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सातवीं शताब्दी के महान भारतीय खगोलविद और गणितज्ञ आचार्य ब्रह्मगुप्त (जन्म 598 ईस्वी, भीनमाल, राजस्थान) ने 628 ईस्वी में तीस वर्ष की आयु में ‘ब्रह्मस्फुटसिद्धांत’ और 665 ईस्वी में ‘खंडखाद्यक’ की रचना की। विश्व के इतिहास में उन्होंने पहली बार शून्य (0) को एक स्वतंत्र संख्या मानकर धनात्मक (‘धन’) तथा ऋणात्मक (‘ऋण’) संख्याओं के साथ जोड़, घटाव और गुणा के सटीक नियम दिए, चक्रीय चतुर्भुज का क्षेत्रफल सूत्र रचा और खगोलीय वेधशाला के यंत्रों से ग्रह-गणित के निरंतर सुधार पर बल दिया।

भीनमाल की यात्रा और एक चार्टर्ड अकाउंटेंट की बही-खाते वाली मुस्कान

जोधपुर के तीस वर्षीय चार्टर्ड अकाउंटेंट हर्षवर्धन राठौड़ अपने पैतृक कस्बे भीनमाल (जालोर ज़िला, राजस्थान) में एक स्थानीय पुस्तकालय के वार्षिकोत्सव में गए थे। वहाँ दीवार पर टँगे एक शिलालेख-चित्र में लिखा था—‘भिल्लमालकाचार्य ब्रह्मगुप्त (जन्म: 598 ईस्वी)’। उसके नीचे संस्कृत का एक छोटा-सा सूत्र और उसका हिंदी अर्थ लिखा था: दो ‘धन’ (संपत्ति) का जोड़ धन होता है, दो ‘ऋण’ (कर्ज़) का जोड़ ऋण होता है, धन और ऋण का अंतर उनके अंतर के बराबर होता है, और यदि दोनों बराबर हों तो परिणाम ‘शून्य’ होता है! हर्षवर्धन मुस्कुरा उठे—एक सीए के रूप में वह रोज़ क्रेडिट, डेबिट और ज़ीरो बैलेंस की जिस भाषा में काम करते हैं, ठीक वही ‘धन’, ‘ऋण’ और ‘शून्य’ की शब्दावली आज से चौदह सौ साल पहले सन् 628 ईस्वी में इसी भीनमाल की धरती पर बैठकर आचार्य ब्रह्मगुप्त ने दुनिया को सिखाई थी। और आश्चर्य की बात यह थी कि यह पूरा बीजगणित किसी व्यापारिक खाता-बही के लिए नहीं, बल्कि आकाश में ग्रहों की वक्री-मार्गी गति और पंचांग की सटीक गणना के लिए रचा गया था।

श्रीमाल (भीनमाल) से उज्जयिनी तक: ‘गणकचक्रचूड़ामणि’ का उदय

सातवीं शताब्दी के प्रारंभ में जब राजा व्याघ्रमुख (चाप वंश) का शासन था, तब राजस्थान का भीनमाल (प्राचीन नाम श्रीमाल या भिल्लमाल) पश्चिम भारत का एक अत्यंत समृद्ध शैक्षणिक और व्यापारिक केंद्र था। यही नगरी संस्कृत के महाकवि माघ (‘शिशुपालवधम्’ के रचयिता) की भी जन्मभूमि रही और इसी नगर में सन् 598 ईस्वी में जिष्णुगुप्त के पुत्र के रूप में ब्रह्मगुप्त का जन्म हुआ। मात्र तीस वर्ष की आयु में सन् 628 ईस्वी (शक संवत् 550) में उन्होंने चौबीस अध्यायों और 1008 श्लोकों वाले अपने विशाल ग्रंथ ‘ब्रह्मस्फुटसिद्धांत’ की रचना की। बाद में वे उज्जयिनी की प्रमुख खगोल वेधशाला के भी प्रमुख रहे और सड़सठ वर्ष की आयु में सन् 665 ईस्वी में उन्होंने पंचांग और खगोलीय गणनाओं की एक अत्यंत व्यावहारिक पुस्तिका ‘खंडखाद्यक’ लिखी। उनकी अद्वितीय गणितीय प्रतिभा से प्रभावित होकर बाद के महान आचार्य भास्कराचार्य द्वितीय ने उन्हें ‘गणकचक्रचूड़ामणि’ (गणितज्ञों के समूह का मुकुट-मणि) की उपाधि से सम्मानित किया।

विश्व को शून्य (0), ‘धन’ और ‘ऋण’ के नियमों की पहली भेंट

यद्यपि भारत में स्थानमान पद्धति और शून्य के चिह्न का प्रयोग ब्रह्मगुप्त से पहले पिंगल, बख्शाली पांडुलिपि और आर्यभट व वराहमिहिर के काल से हो रहा था, किंतु शून्य को केवल एक खाली स्थान (Placeholder) न मानकर उसे एक स्वतंत्र ‘संख्या’ (Number) का दर्जा देना और उसके साथ जोड़, घटाव, गुणा व भाग के स्पष्ट नियम लिखना आचार्य ब्रह्मगुप्त की ऐतिहासिक उपलब्धि है। ‘ब्रह्मस्फुटसिद्धांत’ के अठारहवें अध्याय (कुट्टकाध्याय) में उन्होंने धनात्मक संख्याओं को ‘धन’ और ऋणात्मक संख्याओं को ‘ऋण’ कहा। उन्होंने सूत्र दिया कि किसी धन या ऋण संख्या में शून्य जोड़ने या घटाने से वह संख्या अपरिवर्तित रहती है; शून्य में से धन घटाने पर ऋण और ऋण घटाने पर धन प्राप्त होता है; किसी भी संख्या को शून्य से गुणा करने पर परिणाम शून्य (खगुणः खम्) होता है; और दो ऋणात्मक संख्याओं का गुणनफल धनात्मक (ऋणयोर्वधो धनम्) होता है। खगोल-गणित में जब कोई ग्रह अपने मध्यम स्थान से आगे या पीछे होता था, या उत्तरी-दक्षिणी क्रांति (Declination) और मंदफल-शीघ्रफल का हिसाब लगाना होता था, तब धन और ऋण का यही बीजगणित पंचांग की रीढ़ बनता था।

आचार्य ब्रह्मगुप्त के प्रमुख ग्रंथ और उनके वैज्ञानिक-ज्योतिषीय योगदान

ग्रंथ / अध्यायरचना काल व स्वरूपप्रमुख गणितीय एवं खगोलीय योगदान
ब्रह्मस्फुटसिद्धांत (24 अध्याय)628 ईस्वी (1008 श्लोक, आर्या छंद)प्राचीन ब्रह्म सिद्धांत का प्रत्यक्ष वेध से संशोधन; ग्रहों की मध्यम व स्पष्ट गति, ग्रहण, उदयास्त और चंद्र-शृंगोन्नति का गणित
गणिताध्याय (अध्याय 12)पाटीगणित व ज्यामितिबीस अंकगणितीय संक्रियाएँ, श्रेढ़ी, और वृत्त के भीतर बने चक्रीय चतुर्भुज (Cyclic Quadrilateral) का क्षेत्रफल व विकर्ण सूत्र
कुट्टकाध्याय (अध्याय 18)बीजगणित (Algebra)शून्य (0), धन (+) और ऋण (-) संख्याओं के नियम, द्विघात समीकरण का सूत्र और अनिर्धार्य समीकरण (वर्गप्रकृति: Nx^2 + 1 = y^2)
यंत्राध्याय (अध्याय 22)खगोलीय वेधशाला उपकरणधनुर्यंत्र, तुर्यगोल, यष्टियंत्र, शंकु, घटिका और चक्रयंत्र द्वारा आकाश में ग्रहों के प्रत्यक्ष वेध की विधि
खंडखाद्यक (2 भाग)665 ईस्वी (करण ग्रंथ)मध्यरात्रि (अर्धरात्रिक) प्रणाली पर आधारित पंचांग गणना और द्वितीय कोटि के अंतर्वेशन (Second-order Interpolation) का सूत्र

‘ब्रह्मस्फुटसिद्धांत’: जब प्राचीन ग्रंथ को प्रत्यक्ष वेध से ‘स्फुट’ किया गया

ब्रह्मगुप्त के ग्रंथ के नाम में ही ‘स्फुट’ शब्द जुड़ा है, जिसका अर्थ है—सुधारा हुआ, स्पष्ट किया हुआ या सटीक बनाया हुआ। सातवीं शताब्दी में प्रचलित प्राचीन ‘पैतामह/ब्रह्म सिद्धांत’ की गणनाओं से जब आकाश में ग्रहों की स्थिति मिलाई जाती थी, तो उसमें स्पष्ट अंतर दिखने लगा था। ब्रह्मगुप्त ने अंधभक्ति दिखाने के बजाय घोषणा की कि चूँकि पुराने सिद्धांत में युग के वर्षों और ग्रहों के भगणों (चक्करों) में सूक्ष्म अंतर आने से ग्रहों की गणना प्रत्यक्ष आकाश (दृक्) से मेल नहीं खाती, इसलिए वे वेधशाला के यंत्रों से निरीक्षण करके उसे ‘स्फुट’ (संशोधित) कर रहे हैं। ‘यंत्राध्याय’ और ‘गोलाध्याय’ में उन्होंने बताया कि किस प्रकार शंकु की छाया, जल-घड़ी और चक्रयंत्र की सहायता से सूर्य की क्रांति, अक्षांश और ग्रहों के उदय-अस्त की जाँच हर पीढ़ी के ज्योतिषी को स्वयं करनी चाहिए। आज जब हम दैनिक पंचांग में दृक्-गणित से निकली सटीक तिथियाँ देखते हैं, तो वह ब्रह्मगुप्त के इसी ‘स्फुट’ करने के सिद्धांत की देन है।

बग़दाद में ‘अल-सिंदहिंद’ और विश्व में भारतीय अंकों का प्रसार

विश्व विज्ञान के इतिहास में आठवीं शताब्दी की एक घटना बहुत प्रसिद्ध है। लगभग 770 ईस्वी में सिंध से एक भारतीय खगोलविद प्रतिनिधिमंडल बग़दाद के अब्बासी खलीफ़ा अल-मंसूर के दरबार में पहुँचा और अपने साथ संस्कृत के दो ग्रंथ ले गया—आचार्य ब्रह्मगुप्त का ‘ब्रह्मस्फुटसिद्धांत’ और ‘खंडखाद्यक’। खलीफ़ा के आदेश पर मुहम्मद इब्न इब्राहिम अल-फ़ज़ारी और याकूब इब्न तारिक़ ने इनका अरबी में अनुवाद किया, जो इतिहास में ‘अज़-ज़ीद अल-सिंदहिंद’ (सिद्धांत का अपभ्रंश) और ‘अल-अर्कंद’ (खंडखाद्यक का अपभ्रंश) के नाम से प्रसिद्ध हुए। अगले ही दशक में फ़ारस के महान गणितज्ञ अल-ख़्वारिज़्मी (जिनके नाम से Algorithm और किताब अल-जब्र से Algebra शब्द बना) ने इसी ‘सिंदहिंद’ के आधार पर अपनी खगोलीय सारणियाँ और भारतीय अंकों (किताब अल-जम वल-तफ़रीक़ बिल-हिसाब अल-हिंद) पर पुस्तक लिखी। संस्कृत का ‘शून्य’ अरबी में ‘सिफ़र’ (Sifr) बना और वही लैटिन व यूरोपीय भाषाओं में ‘Cipher’ और ‘Zero’ बन गया। इस प्रकार भीनमाल के ब्रह्मगुप्त के सूत्रों ने पूरे विश्व को आधुनिक गणित की भाषा दी।

चक्रीय चतुर्भुज, ‘वर्गप्रकृति’ और अंतर्वेशन (Interpolation) का कमाल

केवल शून्य ही नहीं, ज्यामिति और उच्च गणित में भी ब्रह्मगुप्त के सूत्र कालजयी हैं। किसी वृत्त के अंदर बने चतुर्भुज (Cyclic Quadrilateral) की चारों भुजाएँ a, b, c, d ज्ञात होने पर उसका सटीक क्षेत्रफल निकालने का सूत्र—वर्गमूल में (s-a)(s-b)(s-c)(s-d), जहाँ s अर्ध-परिमाप है—विश्व में सबसे पहले ब्रह्मगुप्त ने गणिताध्याय के 21वें श्लोक में दिया। बीजगणित में उन्होंने द्विघात समीकरण (Quadratic Equation) के मूल निकालने का स्पष्ट सूत्र दिया और ‘वर्गप्रकृति’ (Pell's Equation: Nx^2 + 1 = y^2) को हल करने की ‘भावना’ (Composition Law) विधि खोजी। इसके अलावा अपने अंतिम ग्रंथ ‘खंडखाद्यक’ में उन्होंने ज्या-सारणी से बीच के कोणों का मान निकालने के लिए ‘द्वितीय अंतर’ (Second-order finite difference interpolation) का सूत्र दिया, जिसे यूरोप में एक हज़ार साल बाद ‘न्यूटन-स्टर्लिंग सूत्र’ के नाम से जाना गया। अपनी जन्म-कुंडली में इसी सूक्ष्म त्रिकोणमिति से निकले ग्रह-अंशों को आप मुफ़्त कुंडली टूल पर देख सकते हैं।

आचार्य ब्रह्मगुप्त के चिंतन से मिलने वाली चार प्रमुख सीखें

  • ज्योतिष और पंचांग की प्रामाणिकता इस बात में है कि कागज़ पर की गई गणना आकाश में दिखने वाले ग्रहण और ग्रहों के उदय-अस्त से शत-प्रतिशत मेल खाए।
  • शून्य (0) अभाव या खालीपन नहीं है, बल्कि धनात्मक और ऋणात्मक दिशाओं के बीच का संतुलन-बिंदु और गणित की एक पूर्ण संख्या है।
  • ज्ञान किसी एक देश या भाषा की सीमा में बँधा नहीं रहता; भीनमाल से उज्जयिनी और वहाँ से बग़दाद होते हुए यूरोप तक पहुँचा ‘सिंदहिंद’ इसका सबसे बड़ा ऐतिहासिक प्रमाण है।
  • जब भी खगोलीय गणना में समय के साथ अंतर आए, तो रूढ़ि से चिपके रहने के बजाय यंत्रों और नए वेध से उसे ‘स्फुट’ (सुधारना) करना ही सच्चा शास्त्र-धर्म है।
धनयोर्धनमृणमृणयोर्धनर्णयोरन्तरं समैक्यं खम्। — आचार्य ब्रह्मगुप्त (ब्रह्मस्फुटसिद्धांत, कुट्टकाध्याय, 18.30: दो धनों का योग धन, दो ऋणों का योग ऋण, और समान धन व ऋण का योग शून्य होता है)

भीनमाल के शून्य से आधुनिक डिजिटल एफ़ेमेरिस तक

भीनमाल के उस पुस्तकालय से बाहर निकलते समय हर्षवर्धन को गर्व के साथ-साथ एक नई वैज्ञानिक दृष्टि भी मिली थी। जिस राजस्थान की मरुभूमि और उज्जयिनी की वेधशालाओं में बैठकर ब्रह्मगुप्त ने चौदह सौ साल पहले शून्य, धन-ऋण, अंतर्वेशन (Interpolation) और स्पष्ट ग्रह-गणित के सूत्र लिखे थे, उन्हीं नियमों पर आज का डिजिटल खगोल-विज्ञान और कंप्यूटर एल्गोरिद्म चलता है। आज Astro Ratan आचार्य ब्रह्मगुप्त की इसी ‘ब्रह्मस्फुट’ यानी प्रत्यक्ष-सिद्ध और शुद्ध गणना की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए स्विस एफ़ेमेरिस और निरयन लाहिड़ी अयनांश से आपकी कुंडली, ग्रह-अंश और दशाओं की गणना करता है। यदि आप भी अपनी जन्म-कुंडली और वर्तमान ग्रह-गोचर को तार्किक, सटीक और भय-मुक्त संदर्भ में समझना चाहते हैं, तो गोचर फल और हिंदी ज्योतिष के माध्यम से इस वैज्ञानिक परंपरा से जुड़ सकते हैं।

Key takeaways

  • आचार्य ब्रह्मगुप्त (598–668 ईस्वी) का संबंध राजस्थान के प्राचीन नगर भीनमाल (भिल्लमाल/श्रीमाल) से था, इसलिए उन्हें ‘भिल्लमालकाचार्य’ भी कहा जाता है।
  • सन् 628 ईस्वी में रचित ‘ब्रह्मस्फुटसिद्धांत’ के अठारहवें अध्याय (कुट्टकाध्याय) में विश्व में पहली बार शून्य (0), धनात्मक (धन/संपत्ति) और ऋणात्मक (ऋण/कर्ज़) संख्याओं के गणितीय नियम लिखे गए।
  • उनके ग्रंथ ‘ब्रह्मस्फुटसिद्धांत’ और ‘खंडखाद्यक’ का आठवीं शताब्दी में बग़दाद के खलीफ़ा अल-मंसूर के दरबार में ‘अल-सिंदहिंद’ और ‘अल-अर्कंद’ नाम से अरबी में अनुवाद हुआ, जिससे भारतीय अंक और खगोल-गणित अरब व यूरोप पहुँचे।
  • ज्यामिति में उन्होंने किसी वृत्त के भीतर बने चतुर्भुज (Cyclic Quadrilateral) का क्षेत्रफल निकालने का प्रसिद्ध सूत्र s = (a+b+c+d)/2 के आधार पर दिया।
  • ब्रह्मगुप्त ने दृढ़ता से कहा कि समय बीतने के साथ पुराने ग्रंथों की ग्रह-स्थिति और आकाश की वास्तविक स्थिति में अंतर आ जाता है, इसलिए यंत्रों से प्रत्यक्ष वेध (Observation) करके गणना को ‘स्फुट’ (सुधारना) करना अनिवार्य है।

राजस्थान के भीनमाल में सन् 628 ईस्वी में आचार्य ब्रह्मगुप्त ने दुनिया को शून्य (0), धन (+) और ऋण (-) के नियम कैसे दिए, और बग़दाद में उनका ग्रंथ ‘सिंदहिंद’ कैसे बना? पढ़िए यह लेख।

शून्य और त्रिकोणमिति के जिस सटीक गणित से आचार्य ब्रह्मगुप्त ने ग्रहों को ‘स्फुट’ किया था, उसी शुद्ध गणना से अपनी कुंडली और वर्तमान समय का अर्थ जानने के लिए Astro Ratan से पूछिए।

FAQ

आचार्य ब्रह्मगुप्त को ‘भिल्लमालकाचार्य’ क्यों कहा जाता है?

प्राचीन काल में राजस्थान के जालोर ज़िले में स्थित ‘भीनमाल’ नगर को भिल्लमाल या श्रीमाल कहा जाता था, जो गुर्जर-प्रतिहार और चाप वंश के समय पश्चिम भारत की राजधानी और शिक्षा का महान केंद्र था। आचार्य ब्रह्मगुप्त का जन्म और कार्यक्षेत्र यही भीनमाल रहा, इसलिए परवर्ती टीकाकारों और आचार्यों ने उन्हें आदरपूर्वक ‘भिल्लमालकाचार्य’ कहकर संबोधित किया।

ब्रह्मगुप्त के ‘ब्रह्मस्फुटसिद्धांत’ में शून्य से भाग देने (Division by Zero) के बारे में क्या लिखा गया था?

ब्रह्मस्फुटसिद्धांत के अठारहवें अध्याय में ब्रह्मगुप्त ने शून्य के जोड़, घटाव और गुणा के बिल्कुल सटीक नियम दिए। शून्य से भाग देने के विषय में उन्होंने लिखा कि शून्य को शून्य से भाग देने पर शून्य होता है और किसी संख्या को शून्य से भाग देने पर वह ‘तच्छेद’ (जिसके हर में शून्य हो, यानी x/0) कहलाती है। आगे चलकर बारहवीं शताब्दी में भास्कराचार्य द्वितीय ने इसमें सुधार करते हुए स्पष्ट किया कि किसी संख्या को शून्य से भाग देने पर ‘खहर’ (अनंत/Infinity) प्राप्त होता है।

आचार्य ब्रह्मगुप्त के ‘ब्रह्मस्फुटसिद्धांत’ और ‘खंडखाद्यक’ में क्या अंतर है?

‘ब्रह्मस्फुटसिद्धांत’ (628 ईस्वी) 24 अध्यायों का एक विशाल और सैद्धांतिक ग्रंथ है, जिसमें कल्प और महायुग के प्रारंभ से ग्रहों की गणना, बीजगणित, ज्यामिति और वेध-यंत्रों का विस्तृत प्रतिपादन है। इसके विपरीत ‘खंडखाद्यक’ (665 ईस्वी) एक ‘करण ग्रंथ’ (व्यावहारिक हैंडबुक) है, जिसमें एक समकालीन Epoch (शक संवत् 587 / सन् 665 ईस्वी) को आधार मानकर और आर्यभट की मध्यरात्रि (अर्धरात्रिक) प्रणाली का उपयोग करके पंचांग की गणना को बहुत तेज़ और सरल बनाया गया है।

ब्रह्मगुप्त के ग्रंथों ने अरब और यूरोप के गणित तथा खगोल-विज्ञान को कैसे प्रभावित किया?

आठवीं शताब्दी (लगभग 770 ईस्वी) में बग़दाद के खलीफ़ा अल-मंसूर के दरबार में ब्रह्मगुप्त के ‘ब्रह्मस्फुटसिद्धांत’ का अनुवाद ‘अज़-ज़ीद अल-सिंदहिंद’ के रूप में हुआ। इसी ग्रंथ के माध्यम से अरब जगत के विद्वानों (जैसे अल-फ़ज़ारी और अल-ख़्वारिज़्मी) ने भारतीय दशमलव प्रणाली, शून्य (सिफ़र), ज्या-सारणी (Sine tables) और ग्रह-गणित की विधियाँ सीखीं, जो बारहवीं सदी में लैटिन अनुवादों के ज़रिए यूरोप पहुँचीं।

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