रुद्राक्ष क्या है? शिव पुराण (विद्येश्वर संहिता) में वर्णित रुद्राक्ष धारण करने के नियम और बाज़ार के नकली रुद्राक्षों से बचने की पहचान
शिव पुराण की विद्येश्वर संहिता (अध्याय 25) और रुद्राक्षजाबालोपनिषद के आलोक में जानिए एकमुखी से चौदहमुखी रुद्राक्ष का स्वरूप, ग्रह-संबंध, नकली दानों का सच और क्यों पंचमुखी रुद्राक्ष सबके लिए सुलभ व पर्याप्त है।
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शिव पुराण की विद्येश्वर संहिता (अध्याय 25) के अनुसार भगवान शिव के लोक-कल्याणकारी नेत्रों से गिरे अश्रु-बिंदुओं से ‘रुद्राक्ष’ वृक्ष (Elaeocarpus ganitrus) की उत्पत्ति हुई। रत्नों के विपरीत रुद्राक्ष का कोई नकारात्मक दुष्प्रभाव नहीं होता। यद्यपि बाज़ार में दुर्लभ एकमुखी या उच्च मुखी रुद्राक्षों के नाम पर लाखों रुपये की ठगी और नकली नक्काशी होती है, किंतु शास्त्र के अनुसार साधारण और सुलभ ‘पंचमुखी रुद्राक्ष’ (कालाग्नि रुद्र स्वरूप) सभी मनुष्यों के लिए पूर्णतः सुरक्षित, शांत और सर्व-कल्याणकारी है।
देहरादून के राजपुर रोड का वह चिकित्सालय और सौरभ का अस्सी हज़ार का रुद्राक्ष
देहरादून के राजपुर रोड पर अपने पुराने आयुर्वेदिक चिकित्सालय में वैद्य चंद्रमोहन बहुगुणा एक मरीज़ की नाड़ी देख रहे थे कि तभी उनके परिचित युवा उद्यमी सौरभ पंत घबराए हुए अंदर आए। सौरभ पिछले कुछ महीनों से उच्च रक्तचाप, अनिद्रा और व्यावसायिक तनाव से जूझ रहे थे। उन्होंने जेब से मखमली डिब्बी निकाली और बोले— ‘वैद्य जी, हरिद्वार के पास एक एजेंट मुझे यह दुर्लभ गोल एकमुखी रुद्राक्ष अस्सी हज़ार रुपये में दे रहा है। कह रहा है कि इसे पहनते ही सूर्य और शनि के सारे दोष कट जाएँगे और करोड़ों का टेंडर मिल जाएगा। मैंने पानी के गिलास में डालकर देखा, यह तुरंत डूब गया, यानी असली है न?’ वैद्य बहुगुणा जी ने अपने चश्मे के लेंस से उस दाने को ध्यान से देखा। उसके पीछे के भाग पर बहुत बारीकी से गोंद और बुरादे से चार धारियाँ भरी गई थीं और बीच में सफ़ेद धातु का छोटा टुकड़ा ठूंसा गया था ताकि वह पानी में भारी होकर डूब जाए। वैद्य जी ने अपने गले से साधारण लाल धागे में पिरोया हुआ सौ रुपये का नेपाली पंचमुखी रुद्राक्ष दिखाते हुए कहा— ‘सौरभ, शिव का आँसू कभी धोखे और लोभ के बाज़ार में अस्सी हज़ार में नहीं बिकता। आओ, पहले तुम्हें शिव पुराण की विद्येश्वर संहिता से समझाऊँ कि असली रुद्राक्ष क्या है।’
शिव पुराण (विद्येश्वर संहिता, अध्याय 25) और रुद्राक्ष की उत्पत्ति
सनातन वाङ्मय में रुद्राक्ष का सबसे प्रामाणिक और विस्तृत वर्णन ‘शिव महापुराण’ की प्रथम संहिता—‘विद्येश्वर संहिता’ के पच्चीसवें अध्याय, ‘श्रीमद्देवीभागवत पुराण’ के एकादश स्कंध (अध्याय 3 से 7), ‘पद्म पुराण’ और ‘रुद्राक्षजाबालोपनिषद’ में मिलता है। ‘रुद्राक्ष’ शब्द दो पदों से मिलकर बना है—‘रुद्र’ (भगवान शिव) और ‘अक्ष’ (नेत्र या अश्रु)। पौराणिक आख्यान के अनुसार, जब त्रिपुरासुर के वध और सृष्टि के कल्याण के लिए भगवान शिव ने सहस्रों वर्षों तक नेत्र खोलकर अखंड ध्यान किया, तब करुणा और श्रम से उनके नेत्रों से कुछ जल-बिंदु पृथ्वी पर गिरे। उन्हीं अश्रु-बिंदुओं से महान ‘रुद्राक्ष वृक्ष’ उत्पन्न हुए। वनस्पति विज्ञान में इसे ‘एलियोकार्पस गैनिट्रस’ (Elaeocarpus ganitrus) कहा जाता है, जो हिमालय की तलहटी (विशेषकर नेपाल के संखुवासभा व भोजपुर क्षेत्र, भारत के पूर्वोत्तर व उत्तराखंड) तथा इंडोनेशिया (जावा) में उगने वाला एक सदाबहार वृक्ष है। इसके नीले रंग के फल (‘ब्लूबेरी’ जैसे दिखने के कारण इसे Blueberry Bead भी कहते हैं) के पकने पर जब ऊपर का गूदा उतार दिया जाता है, तो भीतर से कठोर, प्राकृतिक धारियों (मुखों) वाली गुठली निकलती है, जिसे हम रुद्राक्ष कहते हैं।
रत्न और रुद्राक्ष में अंतर: क्यों रुद्राक्ष कभी नुकसान नहीं करता?
ज्योतिषीय उपायों में लोग अक्सर पूछते हैं कि ‘कहीं यह रुद्राक्ष मुझे उल्टा असर (Side-effect) तो नहीं करेगा?’ यहाँ रत्न और रुद्राक्ष का मौलिक भेद समझना आवश्यक है। खनिज रत्न (जैसे नीलम, मूंगा, पुखराज) प्रकाश की विशिष्ट किरणों को शरीर में तीव्रता से बढ़ाते हैं, इसलिए यदि वह ग्रह कुंडली में अष्टमेश या षष्ठेश हो तो रत्न पहनने से रोग या उग्रता बढ़ सकती है। इसके विपरीत, रुद्राक्ष एक पवित्र वनस्पति-बीज है। आधुनिक जैव-भौतिकी और आयुर्वेद के अध्ययन बताते हैं कि रुद्राक्ष के दाने में विशिष्ट विद्युत-चुंबकीय और परावैद्युत (Dielectric) गुण होते हैं, जो शरीर के स्नायुतंत्र, हृदय-गति और रक्तचाप के अतिरिक्त आवेग को स्थिर (Stabilize) करने में सहायता करते हैं। आयुर्वेद में रुद्राक्ष को उष्ण वीर्य, वात-कफ शामक, शिरोरोग (सिरदर्द व मानसिक तनाव) तथा रक्तचाप को शांत करने वाला बताया गया है। इसलिए रुद्राक्ष किसी ग्रह की क्रूरता को भड़काता नहीं, बल्कि उस ग्रह से उत्पन्न होने वाले मानसिक उद्वेग को भगवान शिव के शांत तत्व में समाहित कर लेता है।
एकमुखी से चौदहमुखी रुद्राक्ष: शिव पुराण के देवता और ज्योतिषीय ग्रह-संबंध
| रुद्राक्ष के मुख | शास्त्रीय अधिष्ठातृ देवता (शिव पुराण) | ज्योतिषीय ग्रह-संबंध एवं सात्विक प्रभाव |
|---|---|---|
| एकमुखी एवं बारहमुखी | साक्षात् शिव (1 मुखी) एवं द्वादश आदित्य/विष्णु (12 मुखी) | सूर्य—आत्मबल, नेतृत्व, नेत्र व हृदय-बल और अहंकार का शमन (12 मुखी अधिक प्रामाणिक व सुलभ) |
| द्विमुखी (दो मुखी) | अर्धनारीश्वर (शिव-शक्ति का संयुक्त स्वरूप) | चंद्रमा—मन की एकाग्रता, भावनात्मक संतुलन और दाम्पत्य व पारिवारिक सामंजस्य |
| त्रिमुखी (तीन मुखी) | अग्नि देव (तीनों अग्नियों—गार्हपत्य, आहवनीय, दक्षिणाग्नि का रूप) | मंगल—अकर्मण्यता, हीन-भावना व क्रोध का शोधन तथा जठराग्नि व साहस में संतुलन |
| चतुर्मुखी (चार मुखी) | चतुर्मुख ब्रह्मा (चारों वेदों व सृजन के अधिपति) | बुध—वाणी, स्मरण-शक्ति, तार्किक क्षमता और विद्यार्थियों की एकाग्रता में वृद्धि |
| पंचमुखी (पाँच मुखी) | कालाग्नि रुद्र (पंचब्रह्म—सद्योजात, वामदेव, अघोर, तत्पुरुष, ईशान) | बृहस्पति (गुरु)—सर्वोच्च सात्विक शांति, रक्तचाप व मन का संतुलन; सभी लग्नों के लिए सार्वभौमिक |
| षण्मुखी एवं तेरहमुखी | भगवान कार्तिकेय (6 मुखी) एवं कामदेव/इंद्र (13 मुखी) | शुक्र—ओज, कलात्मकता, संयम और पारिवारिक व भौतिक संतुलन (6 मुखी अत्यंत सुलभ) |
| सप्तमुखी एवं चौदहमुखी | सप्तमातृका/अनंग (7 मुखी) एवं परम शिव/हनुमान तत्व (14 मुखी) | शनि—साढ़ेसाती, ढैया, स्नायु-कष्ट व आर्थिक अवरोध में धैर्य (7 मुखी सहज और सुलभ) |
| अष्टमुखी एवं नवमुखी | अष्टविनायक गणेश (8 मुखी) एवं नवदुर्गा भगवती (9 मुखी) | राहु (8 मुखी) एवं केतु (9 मुखी)—अज्ञात भय, भ्रम, अनिर्णय और आकस्मिक बाधाओं से रक्षा |
| दशमुखी एवं एकादशमुखी | भगवान जनार्दन विष्णु (10 मुखी) एवं एकादश रुद्र (11 मुखी) | सभी ग्रहों के दिग्भ्रम व वास्तु-भय की शांति (10 मुखी) तथा निर्भीकता व ध्यान-बल (11 मुखी) |
क्यों ‘पंचमुखी रुद्राक्ष’ सबके लिए सर्वोच्च और पर्याप्त है?
शिव महापुराण की विद्येश्वर संहिता (25.73) में कहा गया है: ‘पञ्चवक्त्रः स्वयं रुद्रः कालाग्निर्नाम नामतः, सर्वकामप्रदश्चैव सर्वपापप्रणाशनः।’ अर्थात् पाँच मुख वाला रुद्राक्ष स्वयं ‘कालाग्नि रुद्र’ का स्वरूप है, जो समस्त अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाला और अभक्ष्य-भक्षण व अज्ञान से उत्पन्न सभी पाप-संस्कारों का नाश करने वाला है। प्रकृति का गणित देखिए: रुद्राक्ष के एक पेड़ पर लगने वाले कुल फलों में से लगभग पचासी से नब्बे प्रतिशत फल प्राकृतिक रूप से ‘पंचमुखी’ ही होते हैं। क्यों? क्योंकि भगवान शिव के पाँच मुख हैं (सद्योजात, वामदेव, अघोर, तत्पुरुष और ईशान), हमारा शरीर पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से बना है, हमारे भीतर पंचप्राण हैं और शिव का पंचाक्षरी मंत्र भी ‘नमः शिवाय’ (पाँच अक्षर) है। ज्योतिष में पंचमुखी रुद्राक्ष का संबंध देवगुरु बृहस्पति से माना गया है। यदि कोई व्यक्ति महँगे रत्न या हज़ारों रुपये के दुर्लभ रुद्राक्ष नहीं खरीद सकता, तो एक प्रामाणिक पंचमुखी रुद्राक्ष या उसकी माला ही उसके मन, बुद्धि और स्वास्थ्य की रक्षा के लिए पूर्णतः पर्याप्त है। अपनी कुंडली के ग्रहों की स्थिति आप मुफ़्त कुंडली टूल पर देख सकते हैं।
नकली रुद्राक्ष का गोरखधंधा और ‘पानी वाले टेस्ट’ का वैज्ञानिक सच
आज रुद्राक्ष के नाम पर सबसे बड़ा धोखा ‘गोल एकमुखी’, ‘गौरी-शंकर’ और ‘चौदह से इक्कीस मुखी’ दानों में होता है। वनस्पति विज्ञान के अनुसार असली गोल एकमुखी रुद्राक्ष (Elaeocarpus ganitrus में) अत्यंत दुर्लभ या लगभग अप्राप्य होता है; बाजार में जो काजू के आकार का अर्धचंद्राकार एकमुखी मिलता है, वह वास्तव में दक्षिण भारत व श्रीलंका में पाए जाने वाले एक अन्य प्रजाति के वृक्ष (Elaeocarpus tuberculatus या भद्राक्ष) का बीज है। इससे भी गंभीर धोखा यह है कि कारीगर साधारण पाँच मुखी रुद्राक्ष की चार धारियों को गोंद और लकड़ी के बुरादे से भरकर उसे एकमुखी बना देते हैं, या पंचमुखी पर आरी से और धारियाँ उकेरकर उसे ग्यारह या चौदह मुखी बना देते हैं, और उस पर साँप, त्रिशूल या ॐ की कृत्रिम नक्काशी कर देते हैं। आम ग्राहक ‘पानी के गिलास में डुबोने’ या ‘दो तांबे के सिक्कों के बीच घुमाने’ को असली की पहचान मान लेता है। सच यह है कि कच्चा तोड़ा गया असली रुद्राक्ष भी कई बार नमी कम होने से पानी में तैर सकता है, और नकली लकड़ी के दाने में बारीक सुराख करके पारा या सीसा भर देने से वह तुरंत पानी में डूब जाता है! इसी तरह दो सिक्कों के बीच घूमना केवल असममित आकार के गुरुत्व-केंद्र (Center of Gravity) का भौतिक नियम है, असली होने का प्रमाण नहीं। असली पहचान केवल प्राकृतिक रेशों की निरंतरता, बिना कटे-छँटे मुखों की सीम (दरार) या एक्स-रे (X-Ray) से भीतर के बीज-कोष्ठों (Locules) को गिनकर ही होती है।
शिव पुराण के अनुसार रुद्राक्ष धारण करने के पाँच सात्विक नियम
- जिस रुद्राक्ष में कीड़े लग गए हों, जो टूटा हुआ हो, जिसमें काँटे (उभार) पूरी तरह घिस गए हों, या जिसमें कृत्रिम रूप से छेद करते समय मुख की रेखा कट गई हो, उसे धारण न करें।
- जिस माला से आप मंत्र-जप (सुमिरन) करते हैं और जिस रुद्राक्ष को आप कंठ या भुजा में धारण करते हैं, वे दोनों अलग होने चाहिए; जप की माला को गोमुखी में रखकर जप करें।
- सोमवार, प्रदोष, शिवरात्रि या श्रावण मास के शुभ मुहूर्त (जिसे दैनिक पंचांग से देखा जा सकता है) में रुद्राक्ष को पंचामृत व गंगाजल से स्नान कराकर, चंदन लगाकर ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र के साथ लाल या पीले सूती धागे अथवा चाँदी/सोने में धारण करें।
- रुद्राक्ष धारण करने वाले व्यक्ति को अपने आचरण में पवित्रता रखनी चाहिए—मदिरापान, मांसाहार और अनैतिक आचरण के समय रुद्राक्ष पहनना शास्त्र में निषिद्ध माना गया है।
- रात्रि में सोते समय यदि बड़ा दाना गले में चुभने या टूटने की आशंका हो, तो उसे उतारकर पूजा-स्थान पर रख सकते हैं और प्रातः स्नान के बाद पुनः धारण कर सकते हैं; महीनों बाद रुद्राक्ष सूखने लगे तो उसे साफ करके हल्का तिल या बादाम का तेल लगाया जा सकता है।
रुद्राक्ष की शक्ति उसके महँगे दाम या दुर्लभ मुखों की संख्या में नहीं, बल्कि पहनने वाले के कंठ में बसे ‘नमः शिवाय’ के निरहंकार भाव में होती है।
सौरभ ने चुना पंचमुखी रुद्राक्ष और Astro Ratan का सात्विक मार्गदर्शन
वैद्य चंद्रमोहन बहुगुणा की बात सुनकर सौरभ की आँखें खुल गईं। उन्होंने वह अस्सी हज़ार का कृत्रिम ‘एकमुखी’ एजेंट को लौटा दिया और वैद्य जी के कहने पर एक प्रामाणिक संस्था से केवल दो सौ रुपये का असली नेपाली पंचमुखी रुद्राक्ष लेकर सोमवार को विधिपूर्वक कंठ में धारण किया। साथ ही उन्होंने प्रतिदिन सुबह दस मिनट भ्रामरी प्राणायाम और पंचाक्षरी मंत्र के जप का नियम बनाया। तीन महीनों में उनका रक्तचाप और मानसिक उद्वेग दोनों शांत हो गए। यदि आप भी अपनी जन्म-कुंडली की वर्तमान दशा या गोचर फल के अनुसार यह जानना चाहते हैं कि आपके लिए कौन-सा रुद्राक्ष या सात्विक वैदिक उपाय सबसे उपयुक्त है, तो Astro Ratan से संवाद कर सकते हैं। Astro Ratan आपको बाज़ार के नकली और महँगे प्रलोभनों से बचाकर, शिव पुराण और पाराशर ज्योतिष के प्रामाणिक एवं सुलभ मार्ग से जोड़ता है।
Key takeaways
- शिव पुराण (विद्येश्वर संहिता, अध्याय 25), देवी भागवत और रुद्राक्षजाबालोपनिषद में एकमुखी से लेकर चौदहमुखी रुद्राक्ष के आराध्य देवता, मंत्र और सात्विक नियमों का विस्तृत वर्णन है।
- रत्न (Gemstones) ग्रह की ऊर्जा को बढ़ाते हैं इसलिए ग़लत लग्न में नुकसान कर सकते हैं, किंतु रुद्राक्ष भगवान शिव का प्रसाद और वनस्पति-बीज होने के कारण मन व स्नायुतंत्र को केवल शांत और संतुलित करता है।
- बाज़ार में बिकने वाले गोलाकार ‘एकमुखी रुद्राक्ष’ का बड़ा हिस्सा नकली, जोड़ा हुआ या भद्राक्ष को तराश कर बनाया गया होता है; लाखों रुपये ऐसे संदिग्ध दानों पर खर्च करने से बचना चाहिए।
- प्रकृति में कुल रुद्राक्ष फलों का लगभग पचासी से नब्बे प्रतिशत भाग ‘पंचमुखी’ होता है—यह प्रकृति का संकेत है कि पंचमुखी रुद्राक्ष हर गृहस्थ, विद्यार्थी, महिला व पुरुष के लिए सबसे प्रामाणिक और सुलभ आश्रय है।
- पानी में डूबने या तांबे के सिक्कों के बीच घूमने वाला परीक्षण वैज्ञानिक रूप से पर्याप्त नहीं है; कच्चा या नकली लकड़ी में सीसा (Lead) भरकर भी उसे पानी में डुबोया जा सकता है।
अस्सी हज़ार के नकली ‘एकमुखी’ के जाल में फँसने से पहले पढ़िए शिव पुराण (विद्येश्वर संहिता) का रुद्राक्ष विज्ञान और पंचमुखी रुद्राक्ष की असली महिमा।
आपकी जन्म-कुंडली की चल रही महादशा और मानसिक शांति के लिए कौन-सा रुद्राक्ष और वैदिक मंत्र सबसे अनुकूल है? Astro Ratan से अपनी कुंडली के साथ जानें।
FAQ
शिव पुराण की विद्येश्वर संहिता के अनुसार रुद्राक्ष का सबसे बड़ा आध्यात्मिक लाभ क्या है?
क्या महिलाएँ और बच्चे भी रुद्राक्ष धारण कर सकते हैं?
असली और नकली रुद्राक्ष की पहचान के लिए सबसे भरोसेमंद वैज्ञानिक तरीका क्या है?
नेपाली रुद्राक्ष और इंडोनेशियाई (जावा) रुद्राक्ष में क्या अंतर है?
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