पहिली तनखा घर भेज देंव, त अपन बर कुछु लेना सुवारथी काबर लगथे?
दाई-ददा के त्याग के मान घलो रहय अउ आपके अपन जिनगी के छोटे साध घलो झन मरय, एकर बर तनखा के साफ बंटवारा के तरीका।
Direct answer
पहिली तनखा घर भेजना दाई-ददा के मेहनत के मान आय, फेर अपन पूरा जरूरत अउ छोटे खुसी ल मार देना कोनो धरम नोहय। जब आप अपन तनखा ल तीन साफ हिस्सा मं बांट लेथव, पहिली आपन जरूरी खरचा अउ बचत, दूसर घर के तय मदद, अउ तीसर अपन निजी साध के छोटे रकम, तब अपराध-बोध अपने-आप घट जाथे। तय सीमा ले चले मं घर के सहारा घलो लम्मा समे तक टिकथे।
महासमुंद के बस स्टैंड अउ कांच के पाछू रखे घड़ी
कमलेश मरकाम बाईस बछर के हे। जांजगीर के पॉलीटेक्निक ले पढ़ाई पूरा करे के बाद ओला महासमुंद के एक सोलर पंप कंपनी मं जूनियर तकनीशियन के पहिली नौकरी मिलिस। महीना भर घाम मं गांव-गांव घूम के पंप सुधारे के बाद एक तारीख के संझा ओकर फोन मं बैंक के संदेस आइस: अठारह हजार पांच सौ रुपिया जमा हो गे। कमलेश ह बस स्टैंड तीर के एटीएम के आगू खड़े होके अपन कुरिया के किराया अउ मेस के पांच हजार पांच सौ रुपिया छोड़िस, अउ ग्यारह हजार पांच सौ रुपिया सीधा छुरा गांव मं अपन ददा के खाता मं भेज दिस। हाथ मं पंद्रह सौ रुपिया बचिस। बगल के दुकान के कांच मं नौ सौ रुपिया के एक ठन सादा हाथ-घड़ी चमकत रहिस, जेला ओ ह तीन हफ्ता ले रोज काम ले लहुटत बखत देखत रहिस। ओ ह दुकान के पहली सीढ़ी मं गोड़ रखिस, अउ अचानक ओला सुरता आइस कि घर मं छोटे बहिनी के कॉलेज के फॉर्म भराना हे अउ दाई के माड़ी के दवई चलत हे। कमलेश के गोड़ ठिठक गे। ओला लगिस जइसे अपन कलाई बर घड़ी खरीदना कोनो चोरी के काम आय।
मया के उजास अउ अपराध-बोध के छांव
हमर घर-परिवार मं लइका जब पहिली बेर कमाथे, त ओ पइसा सिरिफ नोट नइ रहय; ओमा दाई के उधारी, ददा के पसीना अउ कतको बछर के तंगी के हिसाब जुरे रहिथे। कमलेश ल बने सुरता हे कि डिप्लोमा के दूसर बछर मं फीस भरे बर ददा ह अपन जुना साइकिल बेच के अउ मंडी मं बोरा ढोके पइसा जोरे रहिस। अइसन मं पहिली तनखा घर भेजना कोनो मजबूरी नोहय, मन के गहिरा उछाह अउ आभार आय। फेर दिक्कत तब सुरु होथे जब आभार अउ आत्म-विलोपन के बीच के लकीर मिट जाथे। मनखे सोचे लगथे कि जब तक घर के हर छोट-बड़ समस्या पूरा खत्म नइ हो जाय, तब तक मोर अपन कोनो साध रखे के हक नइ हे। एक कोती ये सोच परिवार के सुरक्षा अउ अपनपन ल बचाथे, फेर दूसर कोती ये धीरे-धीरे कमाय वाला लइका के भीतर थकान, छुपाव अउ अकेल्लापन भर देथे।
दूनों पल्ला के नफा अउ नुकसान
कहूँ आप अपन पूरा बचत हर महीना घर भेज देथव अउ अपन बर एक कप बढ़िया चाय या नवा जूता लेय मं घलो हिचकथव, त सुरु मं आप ल बहुत बने बेटा या बेटी होय के संतोस मिलथे। घर मं चार झन आपके तारीफ करथें अउ दाई-ददा के चिंता घटथे। फेर एकर कीमत कुछ महीना बाद दिखथे: काम के जगा मं जब संगवारी मन संग बइठे के बेरा आथे या अचानक सेहत बिगड़थे, तब आपके जेब खाली रहिथे। आप अपन जरूरत ल दबाते-दबाते अपन नौकरी ले ही चिढ़े लगथव। दूसर कोती, कहूँ आप घर के परिस्थिति ल बिसरा के सिरिफ अपन सौक मं पइसा उड़ाथव, त ओ सामान तो आ जाथे फेर मन मं घर के प्रति कचोट बने रहिथे। एकरे सेती सवाल ये नोहय कि घर पइसा भेजना हे कि नइ; असली सवाल ये आय कि अइसन कोन हिसाब बनय जेमं घर के चूल्हा अउ दवई घलो सधय, अउ कमलेश जइसे नवा कमाय वाला अपन कलाई के घड़ी बिना संकोच पहिर सकय।
कमलेश के अठारह हजार पांच सौ रुपिया के साफ खाका
| तनखा के हिस्सा | रुपिया | काबर जरूरी हे |
|---|---|---|
| कुरिया किराया, मेस अउ काम मं आय-जाय के भाड़ा | 6,500 | शहर मं टिके अउ काम चालू रखे के बुनियादी खरचा |
| गांव दाई-ददा ल हर महीना तय सहयोग | 7,500 | दवई, राशन अउ बहिनी के पढ़ाई मं पक्का सहारा |
| आड़े-बखत अउ पहिली तनखा के विशेष भेंट कोष | 2,500 | दाई-ददा बर कपड़ा या अचानक आय खरचा बर बचत |
| अपन बिना-सवाल वाला निजी जेब-खरचा | 2,000 | घड़ी, कपड़ा, संगवारी संग नाश्ता या अपन छोटे साध |
पहिली तनखा के भावुक उछाह अउ हर महीना के नियम
पहिली तनखा के दिन मन अतेक भरे रहिथे कि कतको झन अपन पूरा तनखा घर के हाथ मं धर देथें। एक बेर के सगुन रूप मं दाई बर लुगरा या ददा बर पनही ले जाना बहुत सुग्घर बात आय। फेर गलती तब होथे जब पहिली महीना के ओ भावुक रकम ल ही हर महीना के नियम मान ले जाथे। कमलेश ह जब पहिली महीना ग्यारह हजार पांच सौ भेज दिस, त घर के मन सोचिन कि अब हर महीना अतेक पइसा आही, जबकि कमलेश ह ओ महीना अपन बस भाड़ा अउ साबुन-तेल के खरचा घलो उधार मं चलाय रहिस। समझदारी इही आय कि पहिली महीना ही घर मं मया ले बता दे जाय कि ए बेर पहिली तनखा के खुसी मं तीन हजार जादा भेजे हंव, अउ अगली महीना ले सात हजार पांच सौ रुपिया हर पांच तारीख के पक्का आही। साफ बात कहे ले घर के बजट घलो सही बनथे अउ आप ल हर महीना अपन जेब टटोरे नइ परय।
अपन पसीना के कमई ले अपन बर एक ठन जरूरी चीज लेना दाई-ददा के अपमान नोहय; आप बने रहिहव तभे घर के छत लम्मा समे तक थाम सकहव।
अपन बर एक छोटा ‘बिना-सफाई’ भत्ता तय करव
अपन अपराध-बोध ल शांत करे के सबले कारगर उपाय ये आय कि तनखा आते साथ एक छोटे रकम अलग खाता या बटुआ मं रख लेवव, जेकर नाम होय ‘मोर निजी भत्ता’। चाहे ओ रकम हजार रुपिया होय या दू हजार, ओकर ऊपर कोनो अपराध-बोध के पहरा झन रखव। जब घर के तय रकम पहिली ले ईमानदारी संग अलग हो गे हे अउ किराया-राशन के इंतजाम हो चुके हे, तब ए छोटे हिस्सा ले आप घड़ी लेवव, किताब खरीदव या संझा बेरा गरम समोसा खावव, ओमा कोनो के हक नइ मारावत हे। जब तक हर सौ रुपिया खरच करे ले पहिली आप मन मं कचहरी लगाहव, तब तक कमई के सुख नइ मिल पाही। काम के जगा मं घलो जब आप आत्मविश्वास संग रहिथव अउ बनावटी बने बिना लोगन संग संबंध बनाय के तरीका सीखथव, तब आपके काम अउ आगू बढ़थे।
घर मं पइसा के गोठ कइसे करव
- तनखा के पूरा आंकड़ा बताय के संग-संग शहर मं कुरिया किराया, टिफिन अउ काम मं घूमे के असली खरचा घलो शांत भाव ले बतावव, काबर के गांव ले शहर के महंगाई के अंदाजा अक्सर नइ हो पावय।
- घर के मदद ल एक तय तारीख अउ तय रकम मं बांधव, ताकि दाई-ददा ल भरोसा रहय अउ आप ल घलो महीना भर के हिसाब साफ दिखय।
- कहूँ कोनो महीना बहिनी के फीस या घर के मरम्मत जइसे बड़का खरचा आवय, त ओकर बर दू-तीन महीना पहिली ले थोड़ा-थोड़ा अलग जोरव, अचानक अपन खाना-पीना के पइसा झन काटव।
- अपन बर खरीदे छोटे सामान ल घर ले लुकाय के जगा सहज भाव ले देखावव; लुकाय ले ही मन मं चोर जइसे भाव पैदा होथे।
जब घर के सियान मन तनखा के मतलब अलग समझथें
कतको बेर दाई-ददा ल लगथे कि अठारह हजार तनखा के मतलब हे अठारह हजार के पूरा बचत। ओमन अपन जिनगी मं नगद पइसा कम देखे रहिथें, एकरे सेती शहर के किराया, बिजली, इंटरनेट अउ दफ्तर के कपड़ा-लत्ता के खरचा ओमन ल फिजूलखर्ची लग सकथे। अइसन बेरा मं चिढ़े या उल्टा जवाब देय के जरूरत नइ हे। एक बेर छुट्टी मं घर जावव त दाई के तीर बइठ के पूरा महीना के कागज देखावव कि कतका पइसा कहाँ लगथे। जब सियान मन देखथें कि लइका ह फालतू उड़ावत नइ हे बल्कि नियम ले बचत करत हे अउ अपन सेहत अउ काम के जरूरत पूरा करत हे, तब ओमन के मन घलो जुड़ा जाथे। कई बेर त दाई खुद कहि देथे कि बेटा, अपन देह अउ पहिरावा के घलो धियान राखबे।
कुंडली के दसा, जिम्मेदारी के बोझ अउ मन के संतुलन
वैदिक जोतिस मं जब कोनो जुआन मनखे के जिनगी मं कमाय के सुरुआत होथे, त कई बेर विंशोत्तरी महादशा या अंतर्दशा के बदलाव संग जिम्मेदारी के भाव अचानक बढ़ जाथे। सनि या गुरु जइसे ग्रह मन के दसा या गोचर मनखे ल कर्तव्य के प्रति गहिरा बनाथें, फेर एकर ये मतलब कभू नइ होय कि मनखे अपन खुद के अस्तित्व ल बिसरा देय। ग्रह मन पइसा के बंटवारा तय नइ करंय, न ही कोनो राशिफल देख के आप ल अपन जरूरी काम रोके के जरूरत हे, जइसे खराब राशिफल के डर ले बने काम टारे के आदत मं कई झन कर डारथें। कहूँ आप अपन जन्म-पत्री के लग्न, चंद्र राशि अउ चलत महादशा के रोसनी मं अपन काम-धंधा अउ मन के उलझन ल समझना चाहथव, त निःशुल्क कुंडली पन्ना मं अपन सटीक चार्ट देख सकथव। Astro Ratan एक AI वैदिक जोतिसी आय जेन आपके कुंडली के सही डिग्री के हिसाब ले छत्तीसगढ़ी अउ आने भारतीय भाखा मं गोठियाथे, अउ एकर सदस्यता के जानकारी पूरा साफ हे, जिहां एक रुपिया के ट्रायल हे अउ प्रति मिनट के कोनो खरचा नइ लगय।
कमलेश के कलाई मं घड़ी अउ दाई के मुस्कान
ओ संझा कमलेश ह दुकान ले बिना घड़ी लेय कुरिया लहुट गे रहिस, फेर रतिहा भर सोच के ओ ह दूसर दिन अपन कापी मं पूरा महीना के हिसाब लिखिस। अगली तनखा के दिन ओ ह पहिली अपन किराया, मेस अउ पांच सौ रुपिया के आपात बचत अलग करिस, सात हजार पांच सौ रुपिया घर भेजिस, अउ अपन निजी भत्ता ले ओ नौ सौ रुपिया के घड़ी खरीद लिस। संग मं दाई बर तीन सौ रुपिया के नरम चप्पल घलो लिस। जब ओ ह इतवार के छुरा गांव गिस, त दाई ह चप्पल पहिर के सबले पहिली कमलेश के कलाई के घड़ी ल छू के देखिस अउ कहिस कि बने करेस बेटा, काम मं समे देखे बर घड़ी तो चाहीच। कमलेश के मन के ओ भारीपन ओही घड़ी उतर गे। अपन कमई ले अपन जिनगी ल संवारना घर ले दूर जाना नोहय, बल्कि घर के भरोसा ल मजबूत बनाना आय।
Key takeaways
- कृतज्ञता अउ खुद ल मिटा देना एके बात नोहय; दाई-ददा के मान रखे बर अपन छोटे जरूरत ल दोसी ठहराय के जरूरत नइ हे।
- तनखा के दिन पहिली अपन निजी जेब-खरचा अउ बचत अलग करव, ओकर बाद घर के तय रकम भेजव ताकि महीना के बीच मं संकोच झन होय।
- पहिली तनखा मं भावुक होके अइसन रकम झन बांध लेवव जेला हर महीना निभाय मं आपके सेहत या किराया ऊपर असर परय।
- घर मं साफ आंकड़ा बताय ले उमीद संतुलित रहिथे अउ लम्मा समे तक बिना रिस के मदद करे जा सकथे।
जेन संगवारी पहिली नौकरी लगते साथ अपन हर छोटे साध ल मारत हे, ओला तनखा बंटवारा के ये सीधा हिसाब जरूर पढ़ावव।
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